प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 2047 तक देश को विकसित भारत बनाने की जो बात कही जा रही है। वह एक ऐसा झूठ है जिस पर कम से कम अर्थशास्त्र की थोड़ी भी समझ रखने या थोड़ा सा भी पढ़ा लिखा व्यक्ति तो कतई भी भरोसा नहीं कर सकता है। बीते कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में थे। यहंा उन्होने आप्रेशन सिंदूर की सफलता पर एक रोड शो और जनसभा की। जिसमें उन्होने आप्रेशन सिंदूर को राष्ट्रीय एकता और विकसित भारत की अवधारणा से जोड़ते हुए कहा कि हमें अब बहुत जल्द से अपनी अर्थव्यवस्था को चौथी से तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना होगा। अभी नीति आयोग की ब्ौठक के दौरान भारत को जापान को पछाड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा किया गया था। लेकिन आयोग के सदस्यों ने कुछ ही देर में इसका खण्डन भी कर दिया था। मगर झूठ के प्रचार में जुटे देश के मीडिया ने तो इसका डंका पूरे देश में पीट दिया। देश की जनता भले ही सच को न समझ पाये लेकिन प्रधानमंत्री तो सच को जानते है कि भले ही जापान और भारत की जीडीपी लगभग बराबर हो लेकिन अकेले जीडीपी से अर्थव्यवस्था की रेंटिंग तय नही होती है। भारत के मुकाबले जापान क्षेत्रफल और आबादी के हिसाब से 10वां हिस्सा भी नहीं है। अगर जापान और भारत 150 करोड़ रूपये अपने अपने देश की जनता में बांटने लगे तो एक भारतीय के हिस्से में सिर्फ एक रूपया ही आयेगा। जबकि जापान के हर नागरिक की जेब में 15 रूपये पहुंचेेगे। भारत में प्रति व्यक्ति आय 2500 डालर है जबकि जापान में प्रतिव्यक्ति आय 35000 डालर है। भारत भुखमरी की इंडेक्स में 143वें स्थान पर है। देश के 150 करोड़ लोगों की आबादी में से 80 करोड़ लोगों को सरकार 5 किलो गेंहू, 5 किलो चावल मुफ्त मुहैया करा रही है इसके बावजूद भी देश के 20 करोड़ लोगों को भूखे पेट ही सोने पर विवश होना पड़ता है। देश के 43 करोड़ युवा बेरोजगार काम की तलाश में दर—दर की ठोकरे खा रहे है और उनके पास कोई काम नहीं है और देश के प्रधानमंत्री लोगों को झांसा दे रहे है विकसित भारत बनाने का। इससे भी ज्यादा हास्यापद बात यह है कि वह देशवासियों से विकसित भारत के लिए विदेशी सामान का बहिष्कार करने की बात कह रहे है। वह तो लोगों से यहंा तक कह रहे है कि आत्मनिर्भर बनकर हम विकसित भारत बना सकते है। वह लोगों से यहंा तक कह रहे है कि वह अपने घर जाकर उन चीजों की सूची तैयार करे जो विदेशी उत्पाद है और वह उन्हे घर से बाहर फेंक दे। सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री खुद भी ऐसा करने को तैयार है? अगर उन्होने ऐसा किया तो उनके पास तो उस गाड़ी से लेकर जिसमें वह चलते है तथा वह हवाई जहाज जिसमें वह उड़ते है वह पैन जिससे वह लिखते है वह चश्मा जिससे वह देखते है वह घड़ जिसमें वह टाइम देखते है शायद शरीर पर पहने जाने वाले कपड़े तक भी नहीं बचेंगे। न उनके पास फोन बचेगा न वह यंत्र जिसके जरिये वह भाषण देते है। 2015 में चीन के साथ भारत का व्यापार सिर्फ 71 अरब डालर था जो अब 101 अरब डालर हो चुका है। इस विदेशी माल की भरमार के लिए कौन जिम्मेवार है उन्हे यह लोगों को बताना चाहिए? उनका अर्थशास्त्र अगर यह कहता है कि विदेशों से व्यापार बंद करके ही विकसित भारत बन सकता है तो वह प्रधानमंत्री है नोटबंदी की तरह टीवी पर आये और कर दें घोषणा। भगा दे देश से सभी विदेशी कम्पनियों को किसने रोका है? सवाल यह है कि वह यह विकसित भारत का झांसा किसे दे रहे है? जापान की बराबरी तक पहुंचने में अभी आपको सौ साल का समय लग जायेगा? बड़ी—बड़ी फेंक कर कोई भी कुछ बड़ा नहीं कर सकता है। बड़ा बनने के लिए बड़ा करना भी पड़ता है आपके पास तो सच को स्वीकार करने का भी साहस नहीं है। जनता को आप कब तक विकसित भारत का झांसा देंगे यह सोचो।




