अलगाववाद की आग

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पांच राज्यों के चुनाव निपटने के बाद देश में अलगाववाद की जो चिंगारी भड़कती दिख रही है वह देश और समाज के भावी भविष्य के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं है। बात चाहे उस बुलडोजर की राजनीति की हो जिसकी शुरुआत यूपी के सीएम ने माफिया और अपराधियों के खिलाफ की थी, अब इस बुलडोजर की राजनीति राजस्थान में मंदिरों पर चले बुलडोजर से गुजरकर मंदिर मस्जिद तक पहुंच गई है और हिंदू मुस्लिम तक जा पहुंची है। अभी हाल में आगरा से जुड़ी दो घटनाएं सामने आई थी जिनमें एक थी रेलवे स्टेशन से मंदिर को हटाने की और दूसरी ताजमहल देखने गए संत को प्रवेश से रोकने की। इन दोनों घटनाओं के सिरे भी धर्म और आस्था से जुड़े थे। अभी एक सिनेस्टार किच्छा सुदीप के एक वीडियो क्लिप जिसमें उन्होंने कहा था कि अब हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा नहीं रही, ऐसी आग लगाई कि तमाम नेता और अभिनेता राष्ट्रीय भाषा के मुद्दे पर आस्तीने चढ़ाते नजर आए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मंदिर व मस्जिद से लाउडस्पीकर हटाने का अभियान छेड़ा गया तो राजस्थान सरकार ने अलविदा जुम्मे की नमाज के लिए जयपुर में बिजली पोल पर लाउडस्पीकर लगवा किए गए। इस मुद्दे पर हिंदू और मुस्लिम धर्म के तमाम ज्ञानी आमने सामने आकर खड़े हो गए। अभी बीते दिनों उत्तराखंड और दिल्ली सहित कई राज्यों में हनुमान जयंती की शोभायात्रा के दौरान अनेक हिंसक घटनाएं सामने आई। जिन्हें लेकर समाज में भारी टकराव और आक्रोश देखा गया। ईद पर सड़कों पर नमाज पढ़ने की लगाई गई पाबंदी को लेकर भी समाज विभाजित दिखा। बीते कल पंजाब के पटियाला में शिवसेना के कार्यकर्ताओं और खालिस्तान समर्थकों के बीच जो तलवारें खिंची थी वह इस अलगाव किया का ही परिणाम है। बात चाहे कोई भी हो और कहीं से भी शुरू हो राष्ट्र और समाज तथा भाषा और धर्म से जुड़ी हो उसका एक सिरा अलगाववाद से ही जाकर जुड़ जाता है। अभी उत्तराखंड की चार धाम यात्रा में गैर हिंदुओं के प्रवेश को रोकने की मांग उठी थी। इन दिनों देश के कई राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की शुगबुगाहट सुनाई दे रही है लेकिन इसे भी अलगाव के चश्मे से ही देखा जा रहा है। अभी हाल में ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिंदू देवी—देवताओं के खिलाफ अभद्र बातें पढ़ाये जाने से लेकर अयोध्या की कुछ मस्जिदों में रात के अंधेरे में आपत्तिजनक सामग्री फैंके जाने तक तमाम घटनाएं इस अलगाववाद की आग में घी डालने जैसी ही हैं। सवाल यह है कि कौन है वह लोग जो देश को इस नफरत और अलगाववाद की आग में झोंकने का काम कर रहे हैं। इनका पता लगाया जाना जरूरी है। क्योंकि देश में चल रहा यह खेल आग से खेलने जैसा है जिनके परिणाम कभी अच्छे नहीं हो सकते हैं।

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