- मुकदमा दर्ज कर कर्तव्य की इतिश्री क्यों?
देहरादून। स्थानीय लोगों के हंगामे तथा विपक्षी दलों के नेताओं की सक्रियता और सोशल मीडिया में आई खबरों के बाद वन विभाग के अधिकारियों ने जोहड़ी गांव के जंगलों में हो रहे अवैध वृक्ष कटान व कब्जे को रुकवाने की जो कार्रवाई की है क्या वह सिर्फ अपनी नाक बचाने और अकर्मण्यता को छुपाने के लिए किया गया? यह सवाल इसलिए लोगों द्वारा उठाया जा रहा है क्योंकि बिजली विभाग के अवर अभियंता और अवैध निर्माण के आरोपी के खिलाफ सिर्फ मुकदमा दर्ज करके ही वन विभाग के अधिकारियों ने अपने कर्तव्य की इति श्री कर ली है। जंगल के अंदर हुए अतिक्रमण को हटाने का कोई प्रयास 10 दिन बीत जाने के बाद भी नहीं किया गया है।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में भारी विरोध व हंगामें के बाद मंसूरी क्षेत्र के वनाधिकारी मौके पर पहुंचे थे तथा यहां बिछाई जा रही विघुत लाइन को लेकर अवर अभियंता और अतिक्रमण के आरोपी अभिषेक वैश्य के खिलाफ 3 अप्रैल को मुकदमा दर्ज कराया था। वन अधिकार अधिनियमों के तहत मुकदमा तो दर्ज हो गया लेकिन जंगल में किए गए अतिक्रमण को हटाने की कोई कार्यवाही नहीं किया जाना यही संकेत करता है कि यह सिर्फ प्रतीकात्मक कार्यवाई थी जो वन विभाग ने अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए की गई।
उत्तराखंड की धामी सरकार जो आए दिन सीना ठोककर दावा करती है कि राज्य की डेमोग्राफी को लाल, पीली व हरी चादर डालकर जमीन कब्जाने का प्रयास करने वालों को बक्शा नहीं जाएगा। आए दिन मजारों पर बुलडोजर चलाने तथा धार्मिक संरचनाओं को ढहाने की तस्वीरे आती रहती है। धामी का दावा है कि वह अब तक 12 हजार हेक्टेयर भूमि को कब्जा मुक्त करा चुके हैं, लेकिन जोहड़ी गांव के जंगलों में हुए इस अतिक्रमण पर उनका बुलडोजर कब चलेगा। तस्वीरों में इस अतिक्रमण को स्पष्ट देखा जा सकता है। 3 अप्रैल से इसे लेकर हंगामा जारी है लेकिन कार्यवाही कब आगे बढ़ेगी इसका कुछ अता—पता नहीं है।

यहाँ एक चौंकाने वाली और सोचने पर मजबूर करने वाली स्थिति सामने आई है। इसी इलाके में करीब 10 मीटर की दूरी पर स्थित एक मंदिर और एक मजार को सरकार ने अतिक्रमण मानते हुए पहले ही ध्वस्त कर दिया था। लेकिन अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब छोटे धार्मिक ढांचों पर इतनी सख्ती दिखाई गई, तो जंगल के अंदर बने इस बड़े अतिक्रमण पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगल के भीतर हो रहा यह कब्जा खुलेआम नियमों की अनदेखी है, फिर भी जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है।
क्या कानून सिर्फ कमजोरों पर ही चलता है? क्या बड़े अतिक्रमणकारियों को बचाया जा रहा है? अब यह मामला केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि कार्रवाई में दोहरे मापदंड का बनता जा रहा है। इलाके में गुस्सा बढ़ रहा है और लोग जवाब मांग रहे हैं कि जब मंदिर—मजार नहीं बचे, तो जंगल की कोठी कब हटेगी?




