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राजनीति का मोहपास

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पूर्व मुख्यमंत्री तथा कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ व व्योवृद्ध नेता हरीश रावत सूबे की सक्रिय राजनीति से सन्यास न लेने की जिद पर अड़े हुए हैं। लंबे समय से पार्टी द्वारा की जा रही उपेक्षा को जानने समझने के बावजूद भी वह अपने वजूद को बनाए रखने के लिए जिस तरह संघर्ष करते देखे जा रहे हैं वह किसी से भी छिपा नहीं है। सूबे के तमाम कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि उन्हें अब राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। लेकिन हरीश रावत है कि वह कांग्रेस का ढोल बजाते रहने और चुनाव न लड़ने की बात से आगे नहीं बढ़ सके हैं। इससे पूर्व हुए दोनों विधानसभा चुनावों में भी उनका कुछ ऐसा ही रवैया देखा गया था। भले ही वह इस दौरान अपनी बेटी अनुपमा रावत को हरिद्वार सीट से टिकट दिलाने व उन्हें जीत दिलाकर विधायक बनाने में सफल रहे हो लेकिन क्या वह कांग्रेस को जीत दिला पाए? यह सवाल खुद कांग्रेसी नेताओं द्वारा अब उठाया जा रहा है। इस वक्त रामनगर से संजय नेगी की कांग्रेस में ज्वाइनिंग न कराये जाने को मुद्दा बनाकर वह 15 दिनों के राजनीतिक अवकाश पर चल रहे हैं। तमाम लोग उनके इस अवकाश और नाराजगी की वजह संजय नेगी की ज्वाइनिंग नहीं अपने बेटे आनंद रावत को टिकट दिलाना बता रहे है। सवाल यह है कि क्या पार्टी हर बार उनकी बात मानने के लिए बाध्य होगी? कांग्रेस के रुख से तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस अब हरीश रावत के किसी भी दबाव में आकर अपना फैसला नहीं लेना चाहती है। अभी हाल ही में जिन 6 लोगों की कांग्रेस में ज्वॉइनिंग कराई गई उस कार्यक्रम से हरीश रावत को अलग रखा गया। अपने पांच दिवसीय दौरे पर उत्तराखंड प्रदेश प्रभारी कुमारी श्ौलजा के कार्यक्रमों में भी हरीश रावत की मौजूदगी कहीं दिखाई नहीं दी है। रुद्रपुर और हल्द्वानी तथा नैनीताल में कांग्रेस के तमाम नेता मौजूद थे लेकिन हरीश रावत नहीं थे उनके पास भले ही राजनीतिक अवकाश पर होने का बहाना सही, लेकिन हरीश रावत अगर यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि श्ौलजा खुद आकर उनसे मिलेंगीे तो यह उनका मुगालता ही है। दरअसल कांग्रेस के नेता भी अब हरीश रावत की उस दबाव की राजनीति के हथकंडे से परेशान आ चुके हैं जिसके जरिए वह पार्टी में अपना वजूद बनाये रखना चाहते हैं। कांग्रेस द्वारा 2027 के चुनाव के लिए जो नई टीम घोषित की गई है उसमें भी उन्हें कोई जगह नहीं दी गई है। 2016 में कांग्रेस में बड़ा विभाजन कराने वाले डा. हरक सिंह को चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाकर बड़ी जिम्मेदारी दिया जाना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस हरीश रावत के बारे में अब ज्यादा कुछ चिंतन मंथन करने को तैयार नहीं है। हरीश रावत जो डा. हरक सिंह को उजाडु बल्द बताते थे तथा उनकी कांग्रेस में वापसी का भी विरोध करते आए हैं अब वह हरक सिंह, हरीश रावत की नाराजगी पर अपनी प्रतिक्रिया में यह बात कह रहे हैं कि किसी को भी इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि उनके बिना कांग्रेस नहीं रहेगी। कांग्रेस नेताओं के बीच जिस तरह की तल्ख बयान बाजी देखी जा रही है वह कांग्रेस के लिए हितकारी नहीं कहीं जा सकती है। मगर इससे निजात भी आसान नहीं है। हमने देखा है कि भाजपा जिसने 70 साल उम्र पूरी करने वाले नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डालकर राजनीति से बाहर धकेल दिया था वही पीएम मोदी अपने ही नियम को तोड़ कर राजनीति के शीर्ष पर विराजमान है न कुछ छोड़ने को तैयार हैं न पद। दरअसल राजनीति कमबख्त चीज ही ऐसी है कि मरते दम तक इसका मोह एनडी तिवारी की तरह किसी से छोड़ा ही नहीं जाता है फिर हरीश रावत अगर यह मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं तो इसमें उनका क्या दोष है?

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