राजनीति के दांव पेच

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बीते कल प्रदेश कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक के बाद चेयरमैन अविनाश पांडे ने एक बात साफ कर दी है कि 2022 का चुनाव किसी के चेहरे पर नहीं लड़ा जाएगा, पार्टी सामूहिक नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगी। इससे पूर्व कांग्रेस प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव भी चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से मना कर चुके हैं। इससे अब साफ हो चुका है कि कांग्रेस किसी व्यक्ति विशेष के चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ेगी। हरीश रावत और उनके समर्थक जो लंबे समय से चेहरे पर चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे थे और हरीश रावत को सीएम का चेहरा घोषित करने के लिए दबाव बना रहे थे उन्हें थोड़ी निराशा जरूर हो सकती है लेकिन सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने के इस निर्णय का यह मतलब नहीं है कि हरीश रावत को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता। अगर पार्टी चुनाव जीतती है तो उनकी दावेदारी भी बरकरार रहेगी। एक अन्य महत्वपूर्ण बात इस संदर्भ मेंं यह भी है कि खुद हरीश रावत यशपाल आर्य के कांग्रेस में वापसी से पूर्व तथा उनके आने के बाद कई बार यह कह चुके हैं कि उनके सक्रिय राजनीति में रहते हुए अगर किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो वह खुशी—खुशी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को छोड़ देंगे। वही मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के सवाल पर नेता विपक्ष प्रीतम सिंह भी यह कह चुके हैं कि उनका चेहरा भी तो बुरा नहीं है। हरीश रावत और प्रीतम सिंह के इन राजनीतिक बयानों के पीछे क्या—क्या दांव पेच रहे हैं? इसे सभी नेता बखूबी जानते समझते हैं। लेकिन एक बात साफ है कि चुनाव पूर्व सीएम का चेहरा घोषित न किए जाने और सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने के इस फैसले से हरीश रावत की दावेदारी कमजोर जरूर हो गई है। भले ही यह अभी दूर की कौड़ी सही क्योंकि अभी चुनाव जीतना है उसके बाद ही इस पर बात की जा सकती है कि मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए? लेकिन कांग्रेस चुनाव जीतती है तो दलित मुख्यमंत्री का शगुफा छेड़ने वाले हरीश रावत पर यशपाल आर्य भारी पड़ सकते हैं। वही प्रीतम सिंह जो खुद की दावेदारी तो ठोक ही सकते हैं साथ ही खुद को मुख्यमंत्री न बनता देख आर्य के समर्थन में खड़े हो सकते हैं। बीते कुछ दिनों से हरीश रावत खुद ही चुनाव लड़ने से मना कर रहे हैं उनका यह कहना है कि मैं चुनाव लड़ना नहीं लड़ाना चाहता हूं और कांग्रेस को फिर जिताना उनके लिए ज्यादा जरूरी है। उनके इन बयानों का मतलब भी घुमा फिरा कर यही है कि वह कांग्रेस की जीत का सेहरा खुद के सर ही बांधना चाहते हैं अगर जीत का सेहरा उनके सर बंध जाएगा को सीएम का मुकुट तो अपने आप उनके सर सज ही जाएगा। खैर नेताओं के इन राजनीतिक दांव पेंचों से ज्यादा जरूरी है उनके लिए पार्टी की जीत। सीएम का चेहरा घोषित करने पर पार्टी की गुटबाजी जिसका मुखर होना तय था फिलहाल वह सार्वजनिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने के फैसले से इसकी संभावनाएं तो कम हो ही गई है। मुख्यमंत्री बनने की बात रही तो इस पर फैसला लेने के लिए अभी बहुत समय शेष है तब तक गंगा यमुना में बहुत सारा जल बह जाएगा। और स्थितियां परिस्थितियों में भी भारी बदलाव होना स्वभाविक है।

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