नई दिल्ली। अदालती फैसलों में होने वाली देरी को लेकर सुप्रीम ने शुक्रवार को सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया है कि आदेश सुरक्षित रखने के बाद अधिकतम तीन माह के अंदर फैसला सुनाया जाए।चीफ जस्टिस सूर्यकांत जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि फैसलों में देरी से वादियों को अपूरणीय क्षति का सामना करना होता है। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े केस में तेजी लाने को कहा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि जमानत की अर्जियों पर आदेश उसी दिन सुनाए जाने जरूरी हैं। अगर उन्हें सुरक्षित रखा जाता है तो उन्हें अगले ही दिन सुनाया अपलोड किया जाना चाहिए। कई निर्देश को जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत या सजा निलंबित करने का आदेश सुनाए जाने के तुरंत बाद जेल अधिकारियों को सूचित किया जाना चाहिए। विचाराधीन कैदी/दोषी को बेहतर होगा कि उसी दिन, या ज्यादा से ज्यादा अगले दिन रिहा किया जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर फैसले का सिर्फ मुख्य हिस्सा सुनाया जाता है तो फैसले की पूरी जानकारी तर्क समेत 15 दिनों के अंदर वेबसाइट पर अपलोड होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर फैसला सुरक्षित रखने के चार माह के अंदर फैसला नहीं सुनाया जाता है तो संबंधित पक्ष हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से संपर्क कर सकेंगे। इस तरह से मामले को किसी दूसरी बेंच को ट्रांसफर किया जा सकेगा।बेंच का कहना है कि जब किसी निर्णय का पूरा विवरण (तर्क सहित) खुली अदालत में सुनाया गया तो उस निर्णय को 24 घंटे के अंदर वेबसाइट पर अपलोड किया जाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि उसकी ओर से जारी किए इन निर्देशों का उद्देश्य किसी खास जज या हाई कोर्ट के किसी फैसले पर सवाल उठाना नहीं है।




