निष्पक्ष चुनाव की चुनौती

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स्वस्थ लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष चुनाव जरूरी है। लेकिन देश में होने वाले कोई भी चुनाव निष्पक्ष होते हैं? इस सवाल का जवाब हम आप सभी जानते हैं। निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए भले ही निर्वाचन आयोग जिसके पास सभी अधिकार और शक्तियां हैं, द्वारा तमाम नियम कानून बनाए गये हैं और उनका अनुपालन कराने के भरपूर प्रयास किए गए हो। लेकिन निष्पक्ष चुनाव की चुनौती जैसे पांच दशक पूर्व थी वैसी ही चुनौती आज भी बनी हुई है। चुनाव में काले धन के प्रयोग को रोक पाना मुश्किल ही नहीं असंभव हो चुका है। चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा के बाद पुलिस और प्रशासन की मुस्तैदी और आईटी विभाग की छापेमारी में भारी मात्रा में नकदी का पकड़ा जाना इसका एक सबूत है। बात अगर उत्तराखंड की की जाए तो अब तक यहां 11 करोड़ की नगदी और अवैध शराब पकड़ी जा चुकी है। चुनाव आयोग ने भले ही इस बात की व्यवस्था को शक्ति से लागू करने के इंतजाम किए गए हो कि कोई भी प्रत्याशी चुनावी खर्च की सीमा से अधिक खर्च न करने पाए लेकिन किसी भी चुनाव में वही प्रत्याशी चुनावी खर्च की सीमा से कम धन खर्च करते हैं जिनके पास धन नहीं होता है। जो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रत्याशी हैं उनमें से कोई एक भी ऐसा नहीं होता है जो तय खर्च से दो चार गुना अधिक खर्च न करता हो। यह अलग बात है कि यह खर्च का ब्यौरा जितना कम दर्शाया जा सकता है उतना कम दिखाया जाता है। मिथ्या और भ्रामक प्रचार तथा फेंक न्यूज और न्यूज पर भले ही कितनी भी पाबंदी लगा कर रखी जाए लेकिन नेताओं के भाषणों से लेकर राजनीतिक दलों के संकल्प और घोषणा पत्रों तक सिर्फ झूठ का ही प्रचार किया जाता है जो आम जनता को गुमराह करने का माध्यम बन चुका है। जो निष्पक्ष चुनाव की राह में एक बड़ी चुनौती है। भले ही चुनावी दौर में प्रत्याशी मतदाताओं को उपहार न दे सकता हो,ं लेकिन चुनाव से पूर्व राजनीतिक दल और सत्ताधारियों द्वारा जिस तरह से सौगाते बांटी जाती है और आर्थिक सहायता तथा सम्मान राशि और प्रोत्साहन की रेवड़ियंा बांटी जाती है वह कुछ और नहीं चुनावी रिश्वत ही होती है। कोरोना काल में दिए जाने वाला मुफ्त का राशन हो या फिर कोई अन्य सुविधा सब कुछ चुनाव के मद्देनजर ही किया जाता है। एक समय था जब मत पेटियंा लूट ली जाती थी या फिर बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं होती थी लेकिन अभी भी फर्जी मतदान और दबंगों द्वारा अपने पक्ष में मतदान के लिए डराने धमकाने की बातें आम है। चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल और नेता आज भी हर हथकंडा अपनाते हैं। राजनीति से अपराधियों का सफाया आजादी के अमृत काल तक भी नहीं हो सका है। चुनाव में अनाप—शनाप धन के दुरूपयोग के कारण ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा भी मिलता है और निष्पक्ष चुनाव की चुनौती भी कभी खत्म नहीं होती है। धन बल व बाहुबल से सत्ता हासिल करने वालों से हम किसी सामाजिक कल्याण की कामना भला कैसे कर सकते हैं इसलिए आज भी हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती निष्पक्ष चुनाव की है।

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