एक ऐतिहासिक फैसला

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केंद्र की मोदी सरकार द्वारा अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को रद्द करते हुए उसे दो केंद्र शासित राज्यों में बांटने का जो फैसला किया गया था उसे फैसले की देश और विदेश तक तीखी प्रतिक्रियाएं हुई। धारा 370 और 35 ए जिसके तहत इसे स्वायत्तता का अधिकार प्राप्त था उसका दुरुपयोग कथित हुर्रियत जैसे संगठनों द्वारा किस तरह किया जा रहा था और कश्मीर को अपनी बपौती समझ लिया गया था यह किसी से भी छिपा नहीं है। हजारों की संख्या में प्रताड़ित कश्मीरी पंडितों का पलायन होने के बावजूद केंद्रीय सुविधाओं पर उनके ऐश मौज करने के इतिहास से पूरा देश ही नहीं पूरा विश्व वाफिक है। जिस जम्मू कश्मीर सभा ने इसे लागू किया था उसका अस्तित्व समाप्त होने के बावजूद भी यह लोग यह माने बैठे थे कि इसे समाप्त करने का अधिकार केवल उस संविधान सभा को ही है जिसने इसे लागू किया था। लेकिन कल आए सुप्रीम कोर्ट की फैसले के बाद अब सभी के मुगालते दूर हो चुके हैं। देश की सर्वाेच्च अदालत ने केंद्र सरकार के उसे फैसले को ही सही नहीं ठहराया है जो जम्मू कश्मीर से धारा 370 को समाप्त करने का था अपितु जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने और सितंबर 2024 तक अन्य राज्यों की तरह चुनाव कराने का भी निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की रोशनी में अब यह साफ हो गया है कि लद्दाख जिसे केंद्र सरकार द्वारा केंद्र शासित राज्य का दर्जा दिया गया तथा जम्मू कश्मीर एक पूर्ण राज्य बन चुका है। सरकार जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक को पहले ही मंजूरी दे चुकी है तथा यहां सीटों के परिसीमन की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है जिसके अनुसार जम्मू में 43 और कश्मीर में 47 विधानसभा सीटें होगी। 90 सदस्यीय सीटों वाली जम्मू कश्मीर सरकार अगले साल सितंबर में अस्तित्व में आ जाएगी इस काम में अब केंद्र सरकार के आगे संवैधानिक दिक्कतें आने वाली नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने उन 23 याचिकाओं की सुनवाई करते हुए जिनमें धारा 370 को समाप्त किए जाने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए गलत बताया जा रहा था वह फैसला सही था और सुप्रीम कोर्ट ने याचिका कर्ताओं की सभी दलीलों को खारिज कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अब आगे बढ़ने का समय है। कुल मिलाकर जम्मू कश्मीर में एक अच्छी और मजबूत सरकार बनाने के लिए क्या करना है? इस पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को फैसला लेना है कि कैसे आगे बढ़ना है। केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर में चुनाव लड़ने और अपने मताधिकार का प्रयोग करने में सभी उन व्यवस्थापितों को भी शामिल किया गया है जिन्हें बीते समय में कश्मीर छोड़ने पर विवश होना पड़ा। कश्मीर के सभी विस्थापित इस चुनाव में भाग ले सकेंगे। यूं तो केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर से धारा 370 को हटाने का जो फैसला 2019 में किया गया था उसके बाद से जम्मू कश्मीर और लद्दाख के सामाजिक और राजनीतिक हालात में भी भारी बदलाव आया है। कश्मीर जहां स्थानीय नेताओं के संरक्षण में आतंकवाद का जो खेल चल रहा था उसका ताना—बाना अब छिन्न—भिन्न हो चुका है तथा कश्मीर में अमन और शांति की बहाली धीरे—धीरे हो रही है लेकिन अभी पाकिस्तान की सीमा से आतंकवादियों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लग सकता है लेकिन राज्य में अब एक सरकार का गठन होने के बाद यहां के हालात और अधिक तेजी से सुधरेंगे यह लगभग तय हो चुका है। जहां तक भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता और अखंडता का सवाल है इसकी मजबूत और दृढ़ इच्छा शक्ति को बढ़ाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा। तथा जम्मू कश्मीर जिसके बारे में यह कहा जाता है कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यही है, वह वास्तव में स्वर्ग बन जाएगा। जम्मू कश्मीर का आम आवाम जिसने देश की मुख्य धारा से जुड़े रहकर भी अब तक तमाम तरह की मुसीबतें झेली है आने वाले समय में उसे इन तमाम दिक्कतों से मुक्ति मिलने का रास्ता अब तैयार हो चुका है। बस देखना यह है कि जम्मू कश्मीर के पूर्ण राज्य बनने की प्रक्रिया और जम्मू कश्मीर सरकार के गठन में कितना समय लगता है।

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