अधिकारियों की पाठशाला

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उत्तराखंड राज्य गठन से जो एक बात हमेशा चर्चाओं का विषय रही है वह है अफसरशाही की तानाशाही। सूबे की सरकार भले ही किसी की भी रही हो सूबे के मंत्री—विधायक और जनप्रतिनिधि हमेशा ही इस बात की शिकायत करते देखे गए हैं कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते हैं या अपनी मनमर्जी के मुताबिक ही कार्य करते हैं। कुछ नेता सीएम से भी इसकी शिकायतें करते रहे हैं। इन दिनों मंसूरी में राज्य को 2025 तक देश का अग्रणीय राज्य बनाने के लिए जो मंथन किया जा रहा है कल उसके उद्घाटन दिवस पर मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव द्वारा राज्य के अधिकारियों को न सिर्फ अपनी कार्यश्ौली बदलने और सुधारने की हिदायत दे दी गई बल्कि उन्हें साफ साफ शब्दों में चेतावनी तक दे दी गई कि जो अधिकारी फैसला लेने से डरते हैं या फैसला लेने की जिनमें क्षमता नहीं है वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ले। एक बात साफ है कि सूबे के अधिकारियों पर अगर काम को लटकाए रखने या फिर एक विभाग से उसकी जिम्मेदारी दूसरे विभाग पर डाल देने की जो प्रकृति है उसके आरोप पूर्णतया गलत नहीं है। प्रशासन स्तर पर अधिकारियों द्वारा जिस तरह अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की जाती हैं और काम को टाला जाता है उससे किसी भी काम का समय पर पूरा होना संभव नहीं है। अधिकारी जिनके काम और ड्यूटी फैसला लेने की है वह फैसला न लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए एक दूसरे विभाग पर जिम्मेवारी डालकर अपनी जवाबदेही से बचने का प्रयास करने में लगे रहते हैं, उनको काम करने में कोई रुचि नहीं होती वह सिर्फ सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक की अपनी ड्यूटी पूरी करते हैं। ऐसे अधिकारियों को नौकरी करने का वास्तव में कोई अधिकार नहीं है, जो बस फाइलों को फुटबॉल बनाते रहते हैं। उनकी नौकरी में न कहीं सेवा भाव होता है और न जनकल्याण व राज्य विकास की सोच। अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? इसका एक बड़ा कारण है सत्ता में बैठे लोगों को जानकारी का अभाव और तजुर्बे की कमी। अगर कोई मुख्यमंत्री और मंत्री किसी भी योजना या संवैधानिक नियम और कानूनों के बारे में बार—बार किसी अधिकारी को फोन कर यह पूछेगा कि इस विषय में या मुद्दे में क्या किया जाना उचित होगा तो बड़ी साफ बात है कि अधिकारी उसे निपट अज्ञानी और अनाड़ी ही समझेगा और फिर ऐसे सीएम या मंत्री और विधायक के आदेशों का उसके लिए कोई मायने नहीं रह जाएंगे। अगर अधिकारियों से सत्ता में बैठे लोगों को काम लेना नहीं आता है तो फिर अधिकारी उन्हें अपनी उंगलियों पर नचायेंगे ही। अगर सूबे की नौकरशाही बेलगाम है तो इसके लिए सिर्फ अधिकारी जिम्मेदार नहीं है नेता खुद भी जिम्मेदार हैं। कई मंत्री और विधायक अधिकारियों पर बेवजह ही रौब गालिब करने पर आमादा हो जाते हैं और उनसे भिड़ जाते है, निश्चित तौर पर इस प्रकृति को ठीक नहीं समझा जा सकता है। बेहतर शासन व्यवस्था तभी संभव है जब शासन—प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय हो जिसका अभाव उत्तराखंड में हमेशा से रहा है। मसूरी की पाठशाला का सरकार और अधिकारियों को क्या फायदा होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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