सतर्कता के दो माह जरूरी

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बीते डेढ़ साल से पूरा देश कोरोना महामारी के खिलाफ जंग लड़ रहा है। राष्ट्रीय आपदा की इस जंग में जान—माल का जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कैसे और कब तक होगी? इस मुद्दे पर अभी सोचेे जाने से ज्यादा जरूरी यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में कैसे बाहर आया जा सकता है। अभी दूसरी लहर पूरी तरह से समाप्त भी नहीं हुई है कि तीसरी लहर का खतरा सर पर मंडराता दिख रहा है। छह से आठ सप्ताह बाद आने वाली इस तीसरी लहर से बचाव के उपाय करने के लिए बेहद ही कम समय बचा है। सभी राज्य और केंद्र सरकार अपने उपलब्ध संसाधनों से बचाव की तैयारी करने में जुटे जरूर है लेकिन सामाजिक स्तर पर इसे लेकर बरती जाने वाली सतर्कता का भारी अभाव है। बात चाहे उत्तराखंड की हो या फिर दूसरी लहर के दौरान सर्वाधिक प्रभावित महाराष्ट्र और दिल्ली की हर जगह से बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर जिस तरह की भीड़ देखी जा रही है वह हैरान करने वाली है। इतना कुछ होने और देखने के बाद भी क्या कोई इतना लापरवाह हो सकता है? यह एक बड़ा सवाल है। इस मुद्दे को लेकर देश की सर्वाेच्च अदालत ने भी चिंता जाहिर की है। यही नहीं अदालत द्वारा राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि वह कोविड एसओपी का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें। दूसरी लहर के बाद अनलॉक प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई है कि सड़कों से लेकर बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर इस कदर भीड़ उमड़ी देखी जा रही है कि सोशल डिस्टेंसिंग जैसी चीज कहीं भी नजर नहीं आ रही है। लोग मास्क और सैनिटाइजिंग पर भी ध्यान नहीं दे रहे हैं। लोगों का अनावश्यक रूप से घूमना फिरना भी जारी है। अभी व्ौशाख दशहरे के अवसर पर तमाम पाबंदियों के बावजूद हमने देखा कि हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए बड़ी संख्या में लोग हर की पैड़ी और अन्य घाटों तक पहुंच गए। असल में अब पुलिस प्रशासन द्वारा भी अधिक सख्ती नहीं बरती जा रही है। दूसरी अहम बात यह है कि पुलिस भला किस तरह हर किसी के सर पर डंडा लेकर खड़ी रह सकती है। यह व्यवहारिक रूप से भी संभव नहीं है। जब तक हर एक नागरिक स्वतः सतर्कता नहीं बरतता तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। लेकिन यह अनियंत्रित और लापरवाह भीड़ एक बड़े खतरे को आमंत्रित कर रही है जिसे किसी भी स्थिति में रोका जाना जरूरी है। इन दिनों देश भर में युद्ध स्तर पर वैक्सीनेशन अभियान चलाया जा रहा है लेकिन इस तीसरी लहर से पहले देश के 10 फीसदी लोगों को भी वैक्सीन नहीं मिल पाएगी। जब कोरोना की कोई अभी तक दवा बनाई नहीं जा सकी है और टीकाकरण इतनी जल्दी संभव नहीं है तब सिर्फ बचाओ का पहला तरीका लोगों की जागरूकता और सर्तकता ही बचती है इस बात को लोग जितनी जल्दी समझ ले उतना अच्छा होगा। आम आदमी से लेकर सत्ता और शासन—प्रशासन भले ही अनलॉक के लिए अत्यंत उतावले दिख रहे हो और सब कुछ सामान्य दिनों जैसा होने या बनाने की मांग बढ़ रही हो लेकिन अभी कम से कम 2 माह अत्यंत ही धैर्य संयम और सतर्कता से भरे होने चाहिए अन्यथा हालात पहले से भी अधिक गंभीर हो सकते हैं।

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