July 16, 2026देहरादून। फर्जी आईपीएस अधिकारी बनकर लोगों से लाखों रूपये की ठगी करने वाले को पुलिस ने गिरफ्तार कर उसके कब्जे से पांच फर्जी आई कार्ड, विजिटिंग कार्ड, आर्मी—पैरामिलिट्री की वर्दी व एक वायरलेस सेट बरामद किया। पुलिस ने उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।आज यहां पुलिस अधीक्षक नगर प्रमोद कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि डाकरा बाजार निवासी अंशुल उपाध्याय ने राजपुर थाने में मुकदमा दर्ज कराते हुए बताया कि यशोवर्धन नाम के व्यक्ति द्वारा अपने आपको वरिष्ठ अधिकारी बताकर उन्हें होटल जिंजर निकट साई मन्दिर में मिलने के लिए बुलाया तथा उनकी दिवंगत माता की स्मृति में उनके नाम पर एक कम्पनी का पंजीकरण जल्द करने के एवज में उससे 15 लाख रूपये धोखाधडी से ले लिये हैं। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी। वहीं 15 जुलाई को डॉ. अनुषा निवासी सोशल स्टेज हॉस्टल कैनाल रोड ने राजपुर थाने में तहरीर दी कि यशोवर्धन नाम के व्यक्ति द्वारा खुद को आईपीएस अधिकारी बताते हुए उन्हें फर्जी विजिटिंग कार्ड व आईडी दिखायी गयी तथा प्रभाव में लेकर रक्षा मंत्रालय में डाटा साइंस कंसलटेंट के पद पर नौकरी दिलाने के एवंज में धोखाधडी कर 4 लाख 60 हजार रूपये हडप लिये। आरोपी द्वारा स्वयं को फर्जी अधिकारी बताकर लोगों के साथ की जा रही धोखाधडी की घटना की गम्भीरता के दृष्टिगत एसएसपी प्रमेन्द्र डोबाल द्वारा आरोपी की गिरफ्तारी हेतु निर्देश दिये गये तथा राजपुर थाना पुलिस की एक टीम गठित की गयी। गठित टीम के द्वारा मुकदमों में त्वरित साक्ष्य संकलन की कार्यवाही करते हुए दोनों घटनास्थालों का निरीक्षण कर आज पुलिस टीम ने घटना में शामिल यशोवर्धन को सीएसआई तिराहा के पास से गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसने बताया कि उसके पिता वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी है तथा बचपन से उसका सपना अधिकारी बनने का था। बचपन से पिता के साथ रहने के दौरान उसने वरिष्ठ अधिकारियों को मिलने वाली पावर व सुविधा देखी थी। उसके मन में बचपन से ही वरिष्ठ अधिकारी बनने का सपना था। उसने कई सालों तक यूपीएससी परीक्षा की तैयारी की किन्तु उक्त परीक्षा में वह सफल नहीं हो पाया। असफलता हाथ लगने पर उसने खुद को फर्जी आईपीएस व अन्य एजेंनसियों का वरिष्ठ अधिकारी बताकर लोगों पर अपना रौब झाडने लगा। उसके बात करने के तरीके तथा उसकी यूनिफॉर्म व फर्जी आईडी देखकर लोग उसपर आसानी से भरोसा कर लेते थी इसी का फायदा उठाकर वह सालों से कई लोगों के साथ धोखाधडी कर चुका है। पुलिस ने उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसको न्यायालय में पेश किया जहां से उसको न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
July 16, 2026कांग्रेस के लिए संजीवनी या ‘सियासी पिकनिक’ कांग्रेस की साख और राहुल गांधी के सामने खड़ी पहाड़ जैसी चुनौतियाँ देहरादून में कांग्रेस नेता राहुल गांधी क्या बदल पाएंगे कांग्रेस की तकदीर क्या राहुल गांधी करेंगे उत्तराखंड में कांग्रेस के चुनावी रण का शंखनाद देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का प्रस्तावित देहरादून दौरा उत्तराखंड की राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है। इसे केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कांग्रेस के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी का यह दौरा उत्तराखंड में कांग्रेस को नई ऊर्जा देगा या फिर यह भी पिछले दौरों की तरह केवल राजनीतिक संदेश तक सीमित रह जाएगा? उत्तराखंड में कांग्रेस पिछले कई चुनावों से सत्ता से दूर है। पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की चुनौती है। ऐसे में राहुल गांधी का दौरा कार्यकर्ताओं में जोश भरने और चुनावी रणनीति को धार देने का प्रयास माना जा रहा है। कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि यदि 2027 में सत्ता की वापसी करनी है तो उसे केवल भाजपा विरोधी माहौल पर निर्भर रहने के बजाय जनता के बीच मजबूत वैकल्पिक एजेंडा भी पेश करना होगा।राहुल गांधी इन दिनों देशभर में छात्रों की गूंज अभियान के जरिए युवाओं और छात्रों से संवाद कर रहे हैं। उत्तराखंड में भी उनका फोकस युवाओं, बेरोजगारी, पेपर लीक, पलायन, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर रहने की संभावना है। प्रदेश में लंबे समय से सरकारी भर्तियों में देरी, रोजगार के सीमित अवसर और पलायन जैसे मुद्दे कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकते हैं। राहुल गांधी का दौरा भाजपा के लिए भी एक अवसर बन सकता है। भाजपा पहले से ही कांग्रेस पर चुनावी राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। संभावना है कि राहुल के दौरे के दौरान भाजपा केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों चारधाम आल वेदर रोड, रेल परियोजनाएं, रोपवे, निवेश, पर्यटन और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) जैसे मुद्दों को प्रमुखता से सामने रखे। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस केवल सवाल पूछती है, जबकि विकास भाजपा करती है।राहुल गांधी की सभाएं भीड़ जुटा सकती हैं, लेकिन चुनाव केवल भीड़ से नहीं जीते जाते। उत्तराखंड कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटबाजी को नियंत्रित करना है। यदि प्रदेश नेतृत्व एकजुट नहीं दिखा तो राहुल गांधी का संदेश भी सीमित प्रभाव छोड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी के मंच पर प्रदेश के सभी बड़े नेताओं की एकजुट मौजूदगी कार्यकर्ताओं के लिए बड़ा संदेश होगी। भाजपा अब तक राष्ट्रवाद, विकास, धार्मिक पर्यटन और मजबूत नेतृत्व के मुद्दे पर चुनावी बढ़त बनाए हुए है। राहुल गांधी कोशिश करेंगे कि चुनाव की बहस को स्थानीय मुद्दों की ओर मोड़ा जाए महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, किसानों की समस्याएं और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर। यदि कांग्रेस इन मुद्दों को जनआंदोलन का रूप देने में सफल रही, तो चुनावी मुकाबला अधिक रोचक हो सकता है।उत्तराखंड की जनता अब केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं सुनना चाहती। वह यह भी जानना चाहती है कि कांग्रेस सत्ता में आने पर रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर क्या ठोस रोडमैप पेश करेगी। राहुल गांधी का दौरा तभी प्रभावी माना जाएगा, जब उनके भाषण में केवल भाजपा की आलोचना नहीं, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य का स्पष्ट विजन भी दिखाई देगा।राहुल गांधी का दून दौरा केवल राजधानी का कार्यक्रम नहीं होगा। इसके राजनीतिक संदेश पूरे उत्तराखंड में जाएंगे। यह दौरा तय करेगा कि कांग्रेस 2027 के चुनाव में आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए कितनी तैयार है और भाजपा इस चुनौती का जवाब किस रणनीति से देती है। फिलहाल इतना तय है कि दून की यह राजनीतिक दस्तक आने वाले महीनों में उत्तराखंड की चुनावी सियासत का तापमान और बढ़ाने वाली है।
July 16, 2026देहरादून। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से दूनवासी भक्तीमय हुए। यात्रा जहां से भी गुजरती वहां पर फूंलों से उसका स्वागत किया गया तथा कई स्थानों पर भंडारों का भी आयोजन किया गया।आज प्रातः श्रीराम मंदिर दीपकालोनी से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का आयोजन किया गया। रथ यात्रा श्रीराम मन्दिर दीपकालोनी किशननगर चौक, बिन्दाल पुल, अम्बेडकर पार्क— पल्टन बाजार में प्रवेश हुई। पल्टन बाजार में फूंलों से रथ यात्रा का स्वागत किया गया। पल्टन बाजार से धामावाला बाजार, रामलीला बाजार, तिलक रोड से वापस दीपलोक कालोनी तक पहुंचकर रथ यात्रा का समापन किया गया। इस दौरान पुलिस प्रशासन ने शोभा यात्रा के दीपलोक कालोनी से चकराता रोड पर पहूँचने पर बल्लूपुर चौक से ट्रैफिक को आवश्यकतानुसार डायवर्ट किया गया। साथ ही रथ यात्रा के साथ साथ यातायात का संचालन भी किया गया। शोभा यात्रा के बिन्दाल पुल पार करने पर किशननगर चौक से घण्टाघर जाने वाले ट्रैफिक को यातायात दबाव के दृष्टिगत कैण्ट होते हुये डायवर्ट किया गया। शोभा यात्रा के घण्टाघर पार करने पर बिन्दाल से आने वाले यातायात को सामान्य कर दिया गया एवं ओरियण्ट / दर्शनलाल चौक से घण्टाघर आने वाले ट्रैफिक को आवश्यकतानुसार डायवर्ट किया गया। शोभायात्रा के दीपलोक कालोनी पहूँचने पर सभी स्थानों से ट्रैफिक से सामान्य कर दिया गया। इस दौरान पुलिस प्रशासन ने बल्लूपुर चौक, ओरियण्ट चौक, दर्शनलाल चौक, बिन्दाल कट पर बैरियर लगाकर यातायात को रोका गया।
July 16, 2026विकास की बलिवेदी पर कटते पेड़ों ने खड़ा किया ब्लैक हरेला का सवाल ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर उजड़ती हरियाली पर बढ़ रहा है जन-आक्रोश एक तरफ उत्सव, दूसरी तरफ हजारों पेड़ों की बलि पर युवाओं का विरोध देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड इन दिनों अपने सबसे बड़े लोकपर्व हरेला की तैयारी में जुटा है। सरकार हरियाली का संदेश दे रही है, लाखों पौधे लगाने के दावे किए जा रहे हैं, एक पेड़ माँ के नामष् अभियान की चर्चा हो रही है। लेकिन इसी बीच ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर हजारों हरे-भरे पेड़ों पर आरी चल रही है। विडंबना यह है कि जिस समय पूरे प्रदेश में पेड़ों को जीवन का प्रतीक मानकर हरेला मनाने की तैयारी हो रही है, उसी समय विकास के नाम पर वर्षों पुराने वृक्षों की कतारें धराशायी हो रही हैं। यही विरोधाभास अब सड़क पर उतर आया है। पर्यावरण प्रेमियों, युवाओं और सामाजिक संगठनों ने हरेला पर्व से ठीक पहले ब्लैक हरेला अभियान शुरू कर सरकार और व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है क्या पेड़ काटकर हरियाली का पर्व मनाया जाएगा?उत्तराखंड की संस्कृति में हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था का पर्व है। इस दिन लोग पौधे लगाते हैं, धरती को प्रणाम करते हैं और हरियाली के संरक्षण का संकल्प लेते हैं। लेकिन ऋषिकेश-देहरादून मार्ग पर तस्वीर बिल्कुल उलट है। सड़क चौड़ीकरण के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है। कई ऐसे पेड़ भी कट रहे हैं, जिन्होंने दशकों तक राहगीरों को छाया दी, पक्षियों को आश्रय दिया और इस क्षेत्र की जैव विविधता को जीवित रखा। युवाओं का कहना है कि यदि विकास का मतलब केवल पेड़ों की बलि है, तो यह विकास नहीं, पर्यावरणीय घाटा है।काली पट्टी बांधकर विरोध कर रहे युवाओं का संदेश साफ है हरेला केवल पौधे लगाने का सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि पेड़ों को बचाने का सामाजिक संकल्प होना चाहिए। उनका सवाल है कि यदि हजारों परिपक्व पेड़ काट दिए जाएंगे और बदले में कुछ छोटे पौधे लगा दिए जाएंगे, तो क्या दोनों की बराबरी की जा सकती है? एक 40-50 वर्ष पुराने पेड़ की पारिस्थितिक भूमिका को कोई पौधा वर्षों तक पूरा नहीं कर सकता। यह सच है कि सड़कें बननी चाहिए। बेहतर कनेक्टिविटी भी जरूरी है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में आधारभूत ढांचे का विकास विकास यात्रा का अहम हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का मॉडल ऐसा नहीं हो सकता, जिसमें पेड़ों की कटाई न्यूनतम हो? क्या सड़क की डिजाइन, वैकल्पिक संरेखण या वैज्ञानिक योजना से बड़ी संख्या में पेड़ों को बचाया नहीं जा सकता?पर्यावरणविदों का कहना है कि दुनिया के कई देशों में सड़कें जंगलों के बीच से गुजरती हैं, लेकिन पेड़ों को बचाने के लिए इंजीनियरिंग समाधान अपनाए जाते हैं। उत्तराखंड में यह सोच अभी भी सीमित दिखाई देती है। आज सरकारी समारोहों में पौधरोपण की तस्वीरें खूब दिखाई दे रही हैं। मंत्री, अधिकारी और जनप्रतिनिधि पौधे लगाकर सोशल मीडिया पर हरियाली के संदेश साझा कर रहे हैं, लेकिन जनता यह भी देख रही है कि दूसरी ओर बुलडोजर और मशीनें वर्षों पुराने पेड़ों को गिरा रही हैं। यही विरोधाभास ब्लैक हरेला आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बन गया है। वन विशेषज्ञ लगातार कहते रहे हैं कि पौधरोपण और वन संरक्षण दोनों अलग-अलग बातें हैं। एक ओर हजारों परिपक्व पेड़ काट देना और दूसरी ओर कुछ पौधे लगा देना पर्यावरणीय संतुलन की भरपाई नहीं करता।सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि सड़क परियोजनाएँ जनहित में हैं और जहाँ पेड़ काटे जा रहे हैं, वहाँ प्रतिपूरक पौधरोपण किया जाएगा। लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि प्रतिपूरक पौधरोपण तभी प्रभावी होगा जब लगाए गए पौधों का वर्षों तक संरक्षण हो और उनकी जीवित रहने की दर सुनिश्चित की जाए। केवल संख्या घोषित कर देने से जंगल वापस नहीं आ जाते। उत्तराखंड के बुजुर्ग कहा करते थे पेड़ काटने से पहले सौ बार सोचो, लगाने के बाद सौ साल तक बचाओ। आज यही संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक है। यदि हरेला केवल सरकारी आयोजन बनकर रह गया और पेड़ों की सुरक्षा पीछे छूट गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी कि हमने हरियाली का पर्व मनाया था या हरियाली का अंतिम संस्कार?
July 16, 2026युवाओं की बात करने वाले राहुल गांधी, वांगचुक पर हैं चुप सोनम की भूख हड़ताल पर राहुल गांधी की चुप्पी आखिर क्यों? देहरादून। राजनीति में समय का बड़ा महत्व होता है। कब बोलना है, किस मुद्दे पर बोलना है और किस मुद्दे पर चुप रहना है यही किसी नेता की प्राथमिकताओं को तय करता है। इन दिनों कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी देशभर में छात्रों की गूंज अभियान के जरिए छात्रों से संवाद कर रहे हैं। वह शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। तस्वीरें आ रही हैं, वीडियो वायरल हो रहे हैं और संदेश दिया जा रहा है कि कांग्रेस छात्रों की आवाज़ बनना चाहती है। लेकिन इसी दौरान देश के चर्चित शिक्षाविद सोनम वांगचुक छात्रों और व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। शिक्षा सुधार और युवाओं के भविष्य पर वर्षों से काम करने वाला एक व्यक्ति सड़क पर बैठा है, लेकिन राहुल गांधी की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। यही चुप्पी अब सबसे बड़ा सवाल बन गई है।राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि मंच पर छात्र याद आते हैं, लेकिन सड़क पर बैठा शिक्षाविद नहीं। यदि छात्रों की बात करनी है तो क्या केवल राजनीतिक मंचों पर करनी है? क्या छात्र केवल तब महत्वपूर्ण हैं जब उनके बीच कैमरे लगे हों? क्या शिक्षा सुधार केवल चुनावी भाषणों का विषय है? और यदि नहीं, तो फिर सोनम वांगचुक के आंदोलन पर यह असहज मौन क्यों? राहुल गांधी अक्सर कहते हैं कि वह नफरत के खिलाफ मोहब्बत की राजनीति कर रहे हैं और जनता की आवाज सुन रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र में केवल अपनी पसंद की आवाज सुनना संवाद नहीं कहलाता। असली लोकतंत्र तो तब है जब आप उन लोगों की भी सुनें, जो सत्ता से नहीं बल्कि व्यवस्था से सवाल पूछ रहे हों।सोनम वांगचुक कोई अचानक सुर्खियों में आए आंदोलनकारी नहीं हैं। वे शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार के प्रतीक रहे हैं। उनका काम किताबों से ज्यादा प्रयोगशालाओं में दिखाई देता है। उन्होंने शिक्षा को रोजगार और जीवन से जोड़ने की बात की। ऐसे व्यक्ति की भूख हड़ताल पर यदि देश का सबसे बड़ा विपक्ष मौन रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। विडंबना देखिए, एक तरफ छात्रों की गूंज का मंच सजा है, दूसरी तरफ एक शिक्षाविद की भूख हड़ताल की गूंज सुनाई नहीं दे रही। क्या यह चयनात्मक संवेदनशीलता नहीं है? राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि विपक्ष जनता की आवाज होता है। लेकिन यदि विपक्ष भी केवल उन्हीं मुद्दों पर बोले, जहाँ राजनीतिक लाभ की संभावना हो, तो फिर सत्ता और विपक्ष के आचरण में अंतर क्या रह जाएगा?यह प्रश्न केवल राहुल गांधी से नहीं, पूरे विपक्ष से है। आखिर शिक्षा पर गंभीर बहस कब होगी? क्या हर मुद्दा केवल सरकार को घेरने का औजार बनकर रह जाएगा? क्या शिक्षा सुधार पर कोई राष्ट्रीय सहमति नहीं बन सकती? इतना ही नहीं, यह सवाल सत्ता पक्ष से भी उतनी ही मजबूती से पूछा जाना चाहिए। यदि कोई प्रतिष्ठित शिक्षाविद भूख हड़ताल पर बैठा है, तो सरकार की भी जिम्मेदारी है कि संवाद करे। लोकतंत्र में किसी आंदोलन को नजरअंदाज करना समाधान नहीं होता। लेकिन विपक्ष से अपेक्षा इसलिए अधिक होती है क्योंकि उसका काम ही जनता के मुद्दों को उठाना है। यदि विपक्ष भी चुप रहेगा तो फिर लोकतंत्र में आवाज़ कौन उठाएगा?आज का छात्र बहुत समझदार है। वह केवल भाषण नहीं सुनता, बल्कि नेताओं के आचरण को भी देखता है। वह पूछ रहा है जो नेता छात्रों की चिंता की बात करते हैं, क्या वे हर छात्र और हर शिक्षाविद की चिंता भी करते हैं? या फिर चिंता भी राजनीतिक सुविधा देखकर तय होती है? राजनीति में मौन कई बार शब्दों से ज्यादा बोलता है। राहुल गांधी यदि सोनम वांगचुक के आंदोलन से असहमत हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखना चाहिए। यदि सहमत हैं, तो समर्थन देना चाहिए। लेकिन चुप्पी… लोकतंत्र में सबसे कमजोर जवाब मानी जाती है। दिक्कत यह है कि आज राजनीति में मुद्दे नहीं, इवेंट ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। संवाद भी वहीं होता है जहाँ कैमरे हों। धरना भी वहीं दिखाई देता है जहाँ राजनीतिक लाभ हो। बाकी मुद्दे धीरे-धीरे समाचारों की भीड़ में खो जाते हैं।लोकतंत्र में छात्र किसी दल की संपत्ति नहीं होते। उनका भविष्य किसी विचारधारा का बंधक नहीं हो सकता। यदि शिक्षा वास्तव में राष्ट्रीय मुद्दा है, तो उस पर खड़े हर सवाल का जवाब भी राष्ट्रीय स्तर पर ही देना होगा। राहुल गांधी के सामने आज अवसर है कि वह इस चुप्पी को तोड़ें। यदि वे स्वयं को छात्रों का प्रतिनिधि मानते हैं, तो उन्हें उन शिक्षाविदों की आवाज़ भी सुननी होगी, जो वर्षों से शिक्षा सुधार की लड़ाई लड़ रहे हैं। अन्यथा छात्रों की गूंज का संदेश भी केवल राजनीतिक कार्यक्रम बनकर रह जाएगा। सवाल केवल इतना है क्या छात्रों की आवाज़ वहीं तक सुनी जाएगी, जहाँ तक कैमरे पहुँचते हैं? या फिर उस भूख हड़ताल की आवाज़ भी सुनी जाएगी, जहाँ लोकतंत्र अपनी संवेदनशीलता की परीक्षा दे रहा है?
July 16, 2026देहरादून। लोकपर्व हरेला के पावन अवसर पर जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने कलेक्ट्रेट परिसर में विधिवत पूजा—अर्चना के उपरांत वृक्षारोपण कर पर्यावरण संरक्षण एवं हरित उत्तराखण्ड का संदेश दिया।आज यहां उत्तराखण्ड राज्य के लोकपर्व हरेला के पावन अवसर पर जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने कलेक्ट्रेट परिसर में विधिवत पूजा—अर्चना के उपरांत वृक्षारोपण कर पर्यावरण संरक्षण एवं हरित उत्तराखण्ड का संदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ पौधे लगाकर सभी जनपदवासियों से अधिकाधिक पौधारोपण करने तथा लगाए गए पौधों के संरक्षण का संकल्प लेने का आह्वान किया। जिलाधिकारी ने कहा कि हरेला केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और जीवन के प्रति हमारी आस्था, संवेदनशीलता एवं जिम्मेदारी का प्रतीक है। उत्तराखण्ड की समृद्ध लोक संस्कृति सदैव प्रकृति के साथ सह—अस्तित्व का संदेश देती रही है और हरेला पर्व इसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि वृक्ष पृथ्वी की अमूल्य धरोहर हैं। स्वच्छ वायु, जल संरक्षण, जैव विविधता के संरक्षण तथा संतुलित पर्यावरण के लिए वृक्षों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण एवं प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह पौधारोपण को केवल एक औपचारिक कार्यक्रम न मानकर जन—आंदोलन का स्वरूप प्रदान करे। डॉ. चौहान ने कहा कि पौधारोपण तभी सार्थक होगा जब लगाए गए पौधों का नियमित संरक्षण एवं संवर्धन भी सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति से अपने जीवन में कम—से—कम एक पौधा लगाने तथा उसकी देखभाल की जिम्मेदारी निभाने का आग्रह करते हुए कहा कि यही प्रयास आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ, सुरक्षित एवं हरित पर्यावरण प्रदान करने का आधार बनेगा। उन्होंने कहा कि हरेला पर्व हमें पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन और हरित संस्कृति को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है। यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ—साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने का भी संदेश देता है। उन्होंने सभी जनपदवासियों से अपील की कि वे इस अवसर पर अधिक से अधिक पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण अभियान में सक्रिय सहभागिता निभाएं तथा दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। कार्यक्रम के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर में विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण किया गया। उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने पर्यावरण संरक्षण, पौधों के संरक्षण तथा हरित वातावरण के निर्माण का सामूहिक संकल्प लिया। इस अवसर पर अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) के.के. मिश्रा, नगर मजिस्ट्रेट राकेश तिवारी सहित कलेक्ट्रेट के अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।