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‘घुघुती’ पहाड़ के अकेलेपन की ‘होम्योपैथी’

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  • पहाड़ के गांवों, लोकगीतों और स्मृतियों में बसी थी कभी घुघुती
  • चैत की उदासी और काफल पाको का अमर विरह और घुघुती
  • घुघुती एक पक्षी नहीं, पहाड़ की संस्कृति और प्रकृति का प्रतीक
  • मोबाइल टावर व कंक्रीट के बीच वजूद की लड़ रही है लड़ाई

देहरादून। पहाड़ की मुंडेरों, बांज के जंगलों और खेतों की मेड़ों पर दिखने वाली यह घुघुती आज भी उत्तराखंड के ग्रामीण जनजीवन की धड़कन बनी हुई है। उत्तराखंड के लोक-जीवन, गीतों और संस्कृति में रचा-बसा घुघुती पक्षी केवल एक जीव नहीं, बल्कि पहाड़ के सीधेपन और एकांत का सबसे बड़ा प्रतीक है।
स्थानीय लोग घुघुती को शुभ और अपनत्व का प्रतीक मानते हैं। लोक मान्यताओं में इसकी आवाज को घर-आंगन की रौनक से जोड़कर देखा जाता रहा है। उत्तराखंड के प्रसि( लोकगीत घुघुती ना बासा में भी इस पक्षी को बेटी, ममता और घर लौटने की भावना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले गांवों में घुघुती की आवाज हर मौसम में सुनाई देती थी, लेकिन अब इसकी संख्या कम होती महसूस हो रही है। जंगलों में बदलाव, बढ़ता शहरीकरण, कंक्रीट के मकान और गांवों से पलायन ने इसके प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित किया है।
घुघुती केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि पहाड़ की स्मृतियों में बसने वाली वह आवाज है, जो लोगों को अपने गांव, बचपन और प्रकृति से जोड़ती है। आधुनिकता के इस दौर में जरूरत केवल विकास की नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक विरासत को बचाने की भी है, जिसने सदियों से पहाड़ की पहचान बनाई है।
अक्सर लोग घुघुती को एक अलग श्रेणी का पक्षी मानते हैं, लेकिन पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार यह पूरी तरह कबूतर वंश का हिस्सा है। आम कबूतरों की तुलना में घुघुती थोड़ी छोटी, पतली और अधिक सुडौल होती है। इसकी गर्दन पर काले और सफेद मोतियों जैसी चित्तियां होती हैं, जो इसे एक खूबसूरत कंठहार जैसा लुक देती हैं। सामान्य कबूतरों की तरह यह झुंड में हुड़दंग नहीं मचाती। घुघुती बेहद शर्मीली, भोली और शांत स्वभाव की होती है। यह अक्सर अकेले या अपने साथी के साथ ही दाना चुगते हुए दिखाई देती है।
उत्तराखंड के सैकड़ों गांव आज पलायन के कारण खाली हो चुके हैं। इन भूतहा गांवों में जहां इंसानों के कदम पड़ने बंद हो गए हैं, वहां आज भी बुजुर्गों के अकेलेपन को पाटने का काम यह घुघुती ही कर रही है। दोपहर में जब यह घुघुती आकर मुंडेर पर बैठती है और अपनी भाषा में गाती है, तो लगता है कोई अपना हालचाल पूछ रहा है। यह हमारे दुखों की गवाह है। आज के कंक्रीट के बढ़ते जंगलों और मोबाइल टावरों के रेडिएशन के दौर में जहां शहरों से गौरैया और कबूतर गायब हो रहे हैं, वहीं पहाड़ की घुघुती अभी भी प्रकृति का संतुलन बनाए हुए है।


काफल पाको, मैल न चाखो
पहाड़ की लोककथाओं में घुघुती को एक बेटी का रूप माना गया है। चौत-बैशाख के महीने में जब जंगलों में काफल के लाल फल पकते हैं, तो घुघुती की आवाज बदलकर काफल पाको, मैल न चाखो पक गए, पर मैंने नहीं चखे जैसी सुनाई देती है। यह एक मां-बेटी की उस बेबसी की कहानी है, जिसमें एक निर्दाेष बेटी मां के गुस्से का शिकार होकर पक्षी बन गई थी। तब से यह पक्षी पहाड़ की बेटियों के मायके के प्रति प्रेम और विरह का संदेशवाहक बन गया है।

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