वह देश में हिंदू—मुस्लिम करते रह गए और देश की अर्थव्यवस्था का दम निकल गया। उनका दावा था कि उन्होंने 45 करोड लोगों को गरीबों की रेखा से ऊपर निकाला है और अब कह रहे हैं कि देश की आधी आबादी गरीबी की ऐसी खाई में गिरने वाली है जहां से बाहर निकलने में कई दशक का समय लग जाएगा। उनकी कौन सी बात सही है और कौन सी बात गलत है इसका फैसला भी जनता ही करें जिनके कंधों पर देश की अर्थव्यवस्था को संभालने की जिम्मेदारी डालकर प्रधानमंत्री विदेश घूम रहे हैं। लेकिन यह 100 फीसदी सही है कि देश की अर्थव्यवस्था ऐसी गंभीर स्थिति में पहुंचे चुकी है जहां से बाहर निकलने का रास्ता अब सरकार के पास नहीं है। अगर होता तो शायद प्रधानमंत्री अभी दो—चार महीने इस सच को देश से छुपाए ही रखते। डॉलर के मुकाबले रुपए का लगातार कमजोर होना जो अब एक डालर 95 रूपये के बराबर हो चुका है बहुत ही जल्दी 100 के भी पार जाने वाला है। पूर्व पीएम डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल के 10 साल में डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में 35 फीसदी की गिरावट आई थी वहीं पीएम मोदी के 11 साल के कार्यकाल में यह गिरावट 57 फीसदी हुई है। मोदी ने जब सत्ता संभाली थी तब एक डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत 61.03 थी जो आज वर्तमान में 95 तक पहुंच चुकी है। डॉलर के मुकाबले रुपया औसतन चार फीसदी गिरने का गणित था लेकिन इस गिरावट को आरबीआई डॉलर बेचकर आसानी से संभाल लेता था लेकिन अब उसने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही अब विदेशी मुद्रा बचाने के लिए जनता से सोना न खरीदने की अपील कर रहे हो तथा तेल व आम जरूरतों में कटौती के साथ उर्वरको के इस्तेमाल को भी आधा करने का सुझाव दे रहे हो लेकिन सरकार ने खुद बीते माह 168 टन सोना खरीदा है। सीधी बात है कि सोना डॉलर देकर ही खरीदा गया होगा अब भारत के पास कुल स्वर्ण भंडार 880 टन है। इसमें कोई शक नहीं है कि सोना ही एक ऐसी धातु है जो आपदा के समय राष्ट्र व किसी व्यक्ति का सबसे बड़ा सहारा होता है लेकिन 880 टन सोना भी भारत की अर्थव्यवस्था को वर्तमान बदहाली से बाहर निकाल पाने में सक्षम नहीं है। यही कारण है कि पीएम मोदी ने अब आम जनता जो पहले ही बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी की मार से परेशान है, के कंधों पर इस संकट की जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ लिया है और नीदरलैंड में जाकर यह कह रहे हैं कि अगर हमने शीघ्र ही अंतर्राष्ट्रीय सप्लाई चेन की पुख्ता मरम्मत नहीं की तो आने वाले समय में भारत ही नहीं विश्व के तमाम अन्य देशों की भी बड़ी जनसंख्या गरीबी की खाई में चली जाएगी जिसे संभालने में कई दशक का समय लग जाएगा। पीएम मोदी से देश की जनता को यह जरूर पूछना चाहिए की 12 सालों से देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठकर आप क्या कर रहे थे और क्या यह आर्थिक संकट केवल खाड़ी युद्ध के कारण पैदा हुआ है अथवा क्या रातों—रात देश की अर्थव्यवस्था की इतनी खराब हालत हुई है? देश से जिस तेजी से विदेशी निवेशक पलायन कर रहे हैं इस पर कभी आपकी नजर क्यों नहीं गई। अगर किसानों को फर्टिलाइजर नहीं मिलेगा या उसके उपयोग को वह आधा कर देंगे तो देश के खाघान्न उत्पादन में 25 फीसदी गिरावट आना तय है। अभी तो सिर्फ महंगाई बढ़ने की चर्चा हो रही है अगर ऐसा हुआ तो देश में महंगाई बेरोजगारी और गरीबी ही नहीं बढ़ेगी भुखमरी के हालात भी पैदा हो जाएंगे। देश की सत्ता में बैठे लोग इस दशक को आपदाओं का दशक बताकर अपनी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ने में अभी से जुट गए हैं। ऐसी स्थिति में अब सिर्फ भगवान भरोसे ही जनता है।




