प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश पर आए आर्थिक संकट का जिक्र करने के बाद देश की जनता से अपने तमाम खर्चों में कटौती करने की अपील से यह साफ हो गया था कि आने वाला समय में महंगाई का बम फूटना तय है। अब इसकी शुरुआत हो चुकी है। सोने पर टैक्स बढ़ाने से लेकर दूध, पेट्रोल, डीजल व सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी हो चुकी है। इस वक्त महंगाई की दर बीते 42 महीनो के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में हो चुकी अकल्पनीय वृद्धि से पहले ही आम लोगों का जीवन तबाह था लेकिन अब खाड़ी युद्ध के कारण पैदा हुए एनर्जी संकट ने इसमें आग में घी डालने जैसा काम किया है। वर्तमान के जो हालात हैं वह डरावने इसलिए भी है क्योंकि सरकार के पास अब इस समस्या का कोई समाधान नहीं है। हमेशा चुनावी मोड में रहने वाली केंद्र की मोदी सरकार द्वारा सर पर मंडराने वाले इस सबसे बड़े संकट को लंबे समय तक नजर अंदाज किए जाने से इसके दुष्परिणाम और भी अधिक घातक रूप ले चुके हैं। अभी सरकार सिर्फ लोगों से यह न खरीदो वह न खरीदो तथा इसका आयात निर्यात करने न करने में उलझी हुई है वह यह उम्मीद लगाए बैठी है कि देश की जनता सब झेल लेगी और आने वाले समय में स्थितियां सामान्य हो जाएगी लेकिन इसकी संभावना दो—चार प्रतिशत ही है। वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का जो सिलसिला अभी शुरू हुआ है वह अब थमने वाला नहीं है। आने वाले समय में अगर आम लोगों को उनकी जरूरत का समान नहीं मिलेगा या फिर इतनी कीमत पर तो मिलेगा ही कि वह आम आदमी की क्रय क्षमता से बाहर हो जाएगा तब देश में आंतरिक असुरक्षा के कारण अराजकता की भी स्थिति पैदा होने की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता है। देश में कुछ हिस्सों से इस मूल्य वृद्धि के खिलाफ लोगों के सड़कों पर आने की खबरें आनी शुरू हो चुकी हैं। कीमत बढ़ने के साथ—साथ विरोध प्रदर्शन के इन स्वरों को तेज होने से भी कोई नहीं रोक पाएगा? लोगों की यह नाराजगी बेवजह नहीं है जिस सरकार ने अच्छे दिन लाने का भरोसा देकर सत्ता हासिल की हो वह अगर लोगों को अब अपनी आम और जरूरी जरूरतो को भी पूरा करने में स्वयं को लाचार महसूस कर रहे हैं तो यह सरकार की सबसे बड़ी् विफलता ही है। क्या सत्ता में बैठे लोगों को यह पता नहीं था कि देश पर इतना बड़ा संकट आने वाला है और अगर पता था तो सरकार ने समय रहते उसके उचित निदान के लिए कोई तैयारी क्यों नहीं की? पीएम क्यों देश के लोगों को विकसित भारत और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का इनपुट तो परोसते रहे? आज जब पेट्रोल डीजल और रसोई गैस का संकट सामने खड़ा है तो वह तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे का हवाला देते हुए उसकी कीमते बढ़ा रहे हैं अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब तेल की कीमतें कम थी तो मुनाफा कौन कमा रहा था तब जनता को सस्ता पेट्रोल डीजल क्यों नहीं मोहिया कराया गया? हर जगह अब सवाल ही सवाल है। मोदी ने जब देश की सत्ता संभाली थी तब डालर के मुकाबले रुपया 64 के आसपास था जो अब 95 तक पहुंच चुका है सवाल यह है कि इस बीच कभी सरकार की नींद क्यों नहीं टूटी? मोदी कहते हैं हमारा क्या है जी हम तो झोला उठाएंगे और चल देंगे। मोदी का क्या है और जनता का क्या है जी? इस फर्क को भी उन्हें समझना होगा क्योंकि वह देश के प्रधानमंत्री है और उन्हें प्रधानमंत्री देश की जनता ने बनाया है तब क्या जनता उन्हें ऐसे ही झोला उठाकर जाने देगी? विचारणीय सवाल है?




