इस देश और इस देश की आम जनता की यह दुर्दशा होगी किसी ने भी कभी इसकी कल्पना नहीं की होगी। आजादी के अमृत काल का डंका पीटने वालों और लोगों को अच्छे दिन लाने का झांसा देने वालों ने सत्ता में बने रहने के लिए देश के संविधान और लोकतंत्र को जिस तरह से तहस—नहस करने का काम किया है अब उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। भले ही आम जनता इस समय बेतहाशा बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी की चिताओं में ही डूबी हो और उसे इस बात का डर सता रहा हो कि उनका और भावी पीढ़ियों का भविष्य क्या होगा? लेकिन संविधान और लोकतंत्र की सुरक्षा आज का सबसे बड़ा सवाल हो चुका है। अब तक देश के लोग कांग्रेस नेता राहुल गांधी जो लंबे समय से संविधान की लाल किताब को हाथों में लेकर घूमते देखकर सोचते रहे हो कि उनकी बातों में कोई दम नहीं है लेकिन अब उनकी बात इतनी आगे तक पहुंच चुकी है कि देश की सुप्रीम अदालत ने भी उनकी दलीलों पर मोहर लगा दी है। अभी 2 दिन पूर्व जब देश की सबसे बड़ी इन्वेस्टिगेशन संस्था सीबीआई के डायरेक्टर की नियुक्ति होनी थी पीएम आवास पहुंचे नेता विपक्ष ने चीफ जस्टिस के सामने ही इस प्रक्रिया का हिस्सा बनने से इन्कार करते हुए कहा था कि वह कोई रबर स्टैंप नहीं है कि आप उठाकर जहां चाहे लगा दे। जब उनकी सहमति असहमति के कोई मायने ही नहीं है तो वह इसका हिस्सा क्यों बने साथ ही उन्होंने कहा कि वह यहा संवैधानिक मर्यादाओं के कारण आए हैं। यही बात उनके द्वारा बाहर आकर पत्रकारों से भी कही गई। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अब मुख्य निर्वाचन आयोग अध्यक्ष की चयन प्रक्रिया को असंवैधानिक बताए जाने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान जो टिप्पणी की गई है उसे न सिर्फ निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति प्रक्रिया को बल्कि अन्य तमाम संवैधानिक संस्थाओं के अध्यक्षो की नियुक्तियों को असंवैधानिक ठहरा दिया है। चीफ जस्टिस द्वारा अटॉर्नी जनरल से यह पूछा गया है कि अगर नेता विपक्ष और प्रधानमंत्री की राय किसी भी चयन के समय अलग—अलग होती है तो ऐसी स्थिति में क्या तीसरा सदस्य (जो अब कोई भी कैबिनेट मंत्री होता है) नेता विपक्ष की सहमति के साथ जाएगा? तो अटॉर्नी जनरल ने कहा कि शायद नहीं। इस पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहां कि फिर क्या नेता विपक्ष को सिलेक्शन कमेटी का सदस्य बनाना सिर्फ दिखावा भर है? जब सत्ता को ही इसका फैसला करना है तो यह कैसे संवैधानिक हो सकता है। 2023 में मोदी सरकार द्वारा इस संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव करते हुए संवैधानिक संस्थाओं की चयन कमेटी से चीफ जस्टिस का नाम हटाकर उनकी जगह गृहमंत्री या किसी अन्य कैबिनेट मंत्री को चयन समिति के सदस्य के रूप में शामिल करने की व्यवस्था की गई थी। जो विरोध के बाद भी आज तक जारी है। इसी व्यवस्था के तहत निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष से लेकर सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं का मुखिया नियुक्त करने की पूरी शक्ति पीएम के हाथों में आ गई थी जिसका बेजंा इस्तेमाल सत्ता द्वारा किया जा रहा है। अधिकारी कोई भी हो जिसकी नियुक्ति करने व हटाने का अधिकार एक व्यक्ति के हाथ में होगा तो क्या वह अधिकारी पीएम की इच्छा के विरुद्ध कोई काम कर सकता है इस सवाल का जवाब हर आदमी जान समझ सकता है। निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सवाल यूं ही बेवजह नहीं उठते रहे हैं तथा भाजपा व मोदी यूं ही जीत की गारंटी नहीं बन गए हैं। जो उन्हें कोई हरा ही नहीं सकता है? एक अहम सवाल यह है कि जजों की नियुक्तियाें तक पर जब सत्ता का अधिकार हो चुका है तो न्यायपालिका लोकतंत्र और संविधान की रक्षा में कितनी कर्तव्यनिष्ठ हो सकती है? तब ऐसी स्थिति में आप खुद सोच सकते है कि काहे का चुनाव और किसकी सरकार और किसको न्याय और किसकी जांच क्या कुछ भी संभव है? जब संविधान ही नहीं होगा तो फिर लोकतंत्र कैसे बचेगा।




