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वोट मुक्त लोकतंत्र का प्रयास

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बिहार विधानसभा चुनाव से इन पूर्व निर्वाचन आयोग द्वारा कराई जा रहे विशेष गहन पुर्ननिरीक्षण अभियान को लेकर इन दिनों देश की सियासत में भूचाल आया हुआ है। समूचा विपक्ष इस मुद्दे को न सिर्फ सड़कों पर लेकर उतर आया है बल्कि 10 दलों द्वारा इसे लेकर देश की सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया जिस पर बीते कल की गई सुनवाई में भले ही सुप्रीम कोर्ट ने रोक न लगाई गई हो लेकिन चुनाव आयोग को किसी भी तरह की राहत भी नहीं दी गई। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जाय माला बागची की पीठ ने चुनाव आयोग की इस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पीठ का कहना है कि हम किसी भी संवैधानिक संस्था को वह करने से रोक नहीं सकते हैं जो उसे करना चाहिए लेकिन हम वह भी नहीं करने देंगे जो नहीं करना चाहिए। पीठ ने इस बात पर हैरानी जताई है कि इस मतदाता सूची के विशेष पुर्ननिरीक्षण अभियान के तहत मतदाता होने के लिए जो 11 प्रमाण पत्र मांगे गए हैं उन प्रमाण पत्रों को सामान्य लोग तो दूर वह खुद भी इतने कम समय में अर्जित नहीं कर सकते हैं। कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई है कि इस सूची में आधार कार्ड, वोटर कार्ड आईडी और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों को भी मान्य नहीं माना गया है। पीठ ने कहा है कि इन्हें आयोग स्वीकार्य दस्तावेज माने। यही नहीं पीठ द्वारा आयोग की इस कार्रवाई के नाम पर नागरिकता प्रमाण की जांच की कार्यवाही बताते हुए यहां तक कह दिया है कि यह कार्य चुनाव आयोग के कार्य क्षेत्र और अधिकार में नहीं आता है बल्कि यह तो केंद्रीय गृह मंत्रालय का विषय है। मतदाता पहचान पत्र और नागरिकता दोनों अलग—अलग विषय हैं। विपक्षी दलों का आंदोलन जो चुनाव आयोग की इस कार्यवाही के खिलाफ किया जा रहा है इसका मुख्य आधार भी यही है कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं से जो प्रमाण पत्र मांगे जा रहे हैं वह उनके पास है नहीं और वोटर आईडी आधार कार्ड तथा राशन कार्ड जैसे जो दस्तावेज उनके पास मौजूद है उन्हें चुनाव आयोग मान्यता नहीं दे रहा है। जस्टिस धूलिया ने साफ कहा है कि अगर वह दस्तावेज जो बिना पढ़े लिखे लोगों व मजदूरों से मांगे जा रहे हैं वह अगर उनसे भी मांगे जाए तो वह खुद भी इन दस्तावेजों को इतने कम समय में नहीं दे पाएंगे? इन तमाम सवाल जवाबों से चुनाव आयोग की इस कार्यवाही के पीछे जो न चुनाव से पूर्व की जा रही है उसकी मश्ंाा पर सवाल उठना लाजिमी है। एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या आयोग द्वारा की जाने वाली यह कार्यवाही आयोग कर रहा है या फिर केंद्र सरकार के द्वारा कराई जा रही है। बिहार में इसी साल नवंबर में चुनाव होने हैं। आयोग को अगर देश के मतदाताओं की सूची का गहन विशेष पुर्ननिरीक्षण करना ही था तो इसे बिहार से क्यों शुरू किया गया जहां चुनाव होने वाले हैं। आयोग अगर सत्ता के लिए काम नहीं कर रहा है तो वह इसे किसी अन्य राज्य से भी शुरू कर सकता था। एक अनुमान के अनुसार राज्य के एक करोड़ से अधिक वह मतदाता जो बाहर मजदूरी करते हैं तथा बिना पढ़े लिखे हैं चुनाव आयोग द्वारा मांगे जाने वाले दस्तावेज पेश न कर पाने के कारण अपने मत के संवैधानिक अधिकार से वंचित हो जाएंगे या कर दिए जाएंगे। अब इस मामले की सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की गई है कोर्ट ने आयोग से तीन सवालों के जवाब मांगे हैं जिसमें पहला सवाल है कि क्या आयोग के पास मतदाता सूची में संशोधन का अधिकार है दूसरा सवाल है कि आयोग ने मतदाता सूची के पुर्ननिरीक्षण के लिए जो प्रक्रिया अपनाई है वह क्या है। आयोग को इस प्रक्रिया को पूरा करने में कितना समय लगेगा यह भी हैरान करने वाली बात है कि चुनाव आयोग जो कर रहा है उसके बारे में कोर्ट को जानकारी देने के लिए भी महीनो का समय चाहिए जब चुनाव आयोग को यह पता था कि बिहार में नवंबर में चुनाव है तो उसे मतदाता सूचियाें में संशोधन की याद क्यों नहीं आई? सवाल यह है कि क्या देश के लोकतंत्र को भी वोट मुक्त लोकतंत्र बनाने की कोशिश से की जा रही है?

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