- पहाड़ में बंजर खेतों की छाती पर उगती कंटीली झाड़ियां और सिसक रही हमारी विरासत
- जिन खेतों में कभी लहलहाता था धान और मंडुवा, वहां आज उगी हैं कँटीली झाड़ियाँ
- पहाड़ की खेती को निगल गई है वन्यजीवों की मार, गांवों को खा गया पलायन का दंश
देहरादून। पहाड़ के सीढ़ीनुमा खेतों में हरियाली किसी चित्रकार की बनाई तस्वीर जैसी लगती थी। लेकिन आज वही खेत बंजर पड़े हैं। कहीं झाड़ियां उग आई हैं तो कहीं पत्थर और सूखी मिट्टी ने खेती की आखिरी उम्मीद भी निगल ली है। कभी धान, मंडुवा और झंगोरे से लहलहाने वाले उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों के खेत पलायन, बंदर-सुअर आतंक और बदलती जिंदगी ने वीरान बना दिए है।
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में बंजर होते खेत केवल खेती का संकट नहीं, बल्कि टूटते पहाड़ की सबसे दर्दनाक कहानी बन चुके हैं। गांवों से युवाओं का पलायन लगातार बढ़ रहा है, जो हाथ कभी हल चलाते थे, वह अब शहरों में नौकरी और मजदूरी की तलाश में भटक रहे हैं। पीछे बच गए हैं बूढ़े मां-बाप, बंद घर और खाली खेत। पहाड़ की खेती पहले ही मौसम की मार झेल रही थी, ऊपर से बंदरों और जंगली सूअरों ने किसानों की कमर तोड़ दी। कई गांवों में लोगों ने खेती करना इसलिए छोड़ दिया क्योंकि रातभर की मेहनत सुबह उजड़े खेतों में बदल जाती है। खेतों की मेड़ों पर अब बच्चों की आवाजें नहीं, बल्कि सन्नाटा पसरा रहता है।
सबसे बड़ा दर्द यह है कि जिन खेतों ने पीढ़ियों का पेट भरा, आज वही खेत अपने लोगों का इंतजार कर रहे हैं। गांव की बुजुर्ग महिलाएं आज भी आस लगाए बैठी हैं कि शायद इस बार उनका बेटा शहर से लौटकर खेतों में हल चलाएगा। लेकिन हर साल यह उम्मीद भी सूखी मिट्टी की तरह दरकती जा रही है। पहाड़ में खेती केवल रोजगार नहीं थी, वह संस्कृति थी, रिश्तों की डोर थी, सामूहिकता का उत्सव थी। पड़्याल और रोपाई जैसी परंपराएं गांवों को एक परिवार की तरह जोड़ती थीं। आज खेत बंजर हुए तो उनके साथ लोकगीत, मेलजोल और गांव की आत्मा भी सूखने लगी है।
आज पहाड़ के सीढ़ीदार खेत एक अजीब सी खामोशी ओढ़े हुए हैं। यह खामोशी हरी-भरी फसलों की नहीं, बल्कि खेतों के बंजर होने और उनके सीने पर उग आई कटीली झाड़ियों की है। पहाड़ में खेतों के बंजर होने के पीछे एक ऐसा दुष्चक्र है, जिसने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है। ग्रामीणों के मुताबिक खेती छोड़ने की सबसे बड़ी वजह केवल रोजगार की तलाश नहीं, बल्कि जंगली जानवरों का आतंक भी है। पहाड़ के बंजर होते खेत सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं हैं आत्मा के सूखते जाने के जीवंत दस्तावेज हैं।




