पुलवामा आतंकी हमले में 40 सुरक्षा कर्मियों की शहादत के बाद जैसे इस हमले का जवाब पाक और आतंकियों को देना सरकार के लिए बाध्यकारी हो गया था ठीक वैसे ही पहलगाम में 28 निर्दाेषों की हत्या पर कार्यवाही जरूरी थी जो सरकार के द्वारा बहुत ही नियोजित तरीके से की भी गयी। लेकिन इस कार्यवाही के चौथे दिन जिस तरह से अनायास सीज फायर की घोषणा होना और वह भी अमेरिकी धरती से ट्रंप के द्वारा किया जाना सरकार के लिए बड़ी मुसीबत का सबब बन गई है। मात्र तीन दिन में आतंकवाद की रीढ़ और पाकिस्तान के हौसलों को तोड़ने में कामयाब होने के बावजूद भी सरकार ने ऐसा फैसला क्यों लिया इसे लेकर विपक्ष ही नहीं आम जनता से लेकर वह भाजपा के कटृर समर्थकों ने भी पीएम व सरकार को जिस आक्रामकता के साथ निशाने पर लिया गया उसने भाजपा की राष्ट्रभक्ति और हिंदुत्व की छवि के नरेशन को चंद घंटो में ही ध्वस्त कर दिया गया जिसे करने में उसे 10 साल लगे थे और इसके लिए उसने तमाम संवैधानिक सीमाओं को भी तोड़ डाला था। स्थिति इस कदर विकराल बना दी गई थी कि सरकार के खिलाफ बोलने वालों को देशद्रोही बताने में भी नेता कतई नहीं हिचकते थे। कांग्रेस व विपक्ष ने इस बार तो सरकार से एयर स्ट्राइक की तरह कोई सबूत नहीं मांगे हैं लेकिन संसद में कांग्रेस शासन की खामियों को यह कहकर गिनाने वाले गृहमंत्री अमित शाह के वायरल वीडियों में कि अगर पूर्ववर्ती सरकार ने तीन दिन पहले युद्ध विराम नहीं किया होता जब हमारी सेना पंजाब तक पहुंच गई थी तो आज पीओके हमारा होता ऐसे में अब जब मीडिया में पाकिस्तान के कराची और लौहार तक कब्जा करने का प्रचार किया जा रहा था तो युद्ध विराम (सीज फायर) का फैसला क्यों किया गया? क्यों पीओके पर कब्जा करने का अवसर गंवा दिया गया इस पर सवाल उठने लाजिमी है। लोगों को इंदिरा गांधी की याद आना भी स्वाभाविक है और मैं ट्टशीश नहीं झुकने दूंगा, का दावा करने वाले पीएम से सवाल करना भी लाजमी है कि भारतीय सेनाओं ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह का पराक्रम और शौर्य का प्रदर्शन किया है उसके लिए सेना का सम्मान होना ही चाहिए था अच्छा है कि पहले कांग्रेस ने देश में तिरंगा यात्रा निकाली और अब भाजपा भी तिरंगा शौर्य यात्रा निकाल रही है लेकिन मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर जिस तरह की टिप्पणी की गई वह यह बताने के लिए काफी है कि भाजपा सेना के शौर्य का कितना सम्मान करती है भाजपा को इतनी देर से तिरंगा शौर्य यात्रा का ध्यान क्यों आया? सही मायने में यह अब इस पूरे प्रकरण को लेकर उठने वाले सवालों पर पर्दा डालने और डैमेज कंट्रोल के ही प्रयास है जो डीजीएमओ की पत्रकार वार्ता जिसमें पाक को हुए नुकसान का ब्यौरा दिया से होते हुए पीएम के राष्ट्रीय संबोधन और आदमपुर एयरवेज पर सैनिकों के बीच जाने से लेकर उन तिरंगा शौर्य यात्राओं के आयोजन तक पहुंच चुका हैं। मोदी सरकार और भाजपा इसमें कितना सफल हो पाती है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। इस पूरे प्रकरण में एक बार फिर मीडिया का वह कुरूप चेहरा भी सामने आ गया है जब वह देश की रक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अपनी टीआरपी और सरकार की चापलूसी करने में मगरूर दिखाई दी। जिसके कारण उसने इंटरनेशनल स्तर पर खूब किरकिरी कराई। देखना होगा क्या केंद्र सरकार उसके इस गैर जिम्मेदाराना तरीके को रोकने के लिए कुछ करती है या नहीं।


