आफत की बरसात

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बीते कई दिनों से उत्तराखंड में झमाझम बारिश का दौर जारी है राज्य की तमाम प्रमुख नदियां उफान पर हैं नदी, नाले और खालो के किनारे बसी बस्तियों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। वही भारी बरसात के कारण पहाड़ों से मलवा और बड़े—बड़े बोल्डर आने से तमाम प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों सहित 200 से भी अधिक सड़कों पर आवागमन ठप हो गया है। राज्य में चल रही चार धाम यात्रा पर तो जैसे पूरी तरह से ब्रेक ही लग चुका है। चारों धामों में अब गिने—चुने ही श्रद्धालु ही पहुंच पा रहे हैं यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि पहले प्री मानसूनी बारिश और अब मानसूनी बारिश के पहले ही दौर ने पहाड़ के जनजीवन को पूरी तरह से अस्त—व्यस्त कर दिया है। गनीमत इस बात की है कि अब तक किसी तरह की जनधन हानी या कोई बादल फटने जैसी बड़ी घटना सामने नहीं आई है। जहां तक राज्य की नदियों के बढ़ते जल स्तर की बात है तो गंगा व जमुना से लेकर सरयू, गोमती और धौली गंगा तथा गौला नदी व अलकनंदा इस समय उफान पर है। अभी अलकनंदा का जलस्तर बढ़ने से बद्रीनाथ धाम में तृप्त कुंड सहित बड़े क्षेत्र में पानी आने के कारण भवनोें को खाली कराना पड़ा था। अब तक बागेश्वर और चंपावत में सबसे अधिक बारिश रिकार्ड की गई है यहां सरयू और धौली गंगा के प्रभाव क्षेत्र में आबादी प्रभावित हुई है। वही उत्तरकाशी के शिव मंदिर और घाट डूब चुके हैं। ऋषिकेश में गंगा का जलस्तर बढ़ने से निचले क्षेत्रों को खाली करना पड़ा है। अभी बीते दिनों हरिद्वार की सूखी नदी के जल प्रभाव में 8—10 कारे बह गई थी जिन्हें किसी तरह रेस्क्यू कर बाहर निकला गया। राज्य के तमाम प्रमुख नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे पर सैकड़ो स्थान पर भूस्खलन जोन बन जाने से यातायात पूरी तरह प्रभावित हुआ है। भले ही बीआरओ और पीडब्लूडी की टीमों को प्रभावित क्षेत्रों में जेसीबी मशीनों के साथ तैनात किया गया है तथा वह सड़कों को खोलने के काम में जुटी हुई है लेकिन इस लगातार बारिश के दौर में सड़कों को खोलने का काम सबसे बड़ा जोखिम भरा काम है क्योंकि पहाड़ से कब कितना मलवा नीचे आ जाएगा इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। एक स्थान पर सड़कों को साफ किया जाता है तो दो नई जगह मलवा आने से मार्ग बाधित ही बना रहता है। नैनीताल में कुछ भूस्खलन जोन में आवासीय हिस्से भी उसकी जद में आ चुके हैं। यही नहीं नगरीय क्षेत्रों की बात कर तो देहरादून से लेकर हरिद्वार और रामनगर से लेकर कोटद्वार तक तमाम जगह जल भराव और जल जमाव के कारण लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है दरअसल मानसूनी काल में सुरक्षा और सेफ्टी ऑडिट की बातें तो बहुत की जाती है लेकिन अगर कहीं कोई पुल या पुलिया टूट जाती है तो उसे ठीक करने में कई—कई साल का समय लग जाता है। जो सड़के बारिश के तेज बहाव में बह जाती हैं बारिश के चलते उनकी मरम्मत का काम भी संभव नहीं है। यही कारण है कि साल दर साल पहाड़ को मानसून काल में तमाम तरह की दिक्कतें झेलनी ही पड़ती है। जिनका अंत बारिश खत्म होने पर ही होता है।

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