देश में चल रहे 18वीं लोकसभा चुनाव के दो चरणों का मतदान संपन्न हो चुका है। 190 सीटों पर हुए इस मतदान को लेकर तमाम राजनीतिक समीक्षक अपनी—अपनी सोच और अनुभव के आधार पर चुनावी हवा का आकलन करने में जुटे हैं। किसी के द्वारा मतदान प्रतिशत के कम या ज्यादा होने के मायने तलाशे जा रहे है तो कोई 2014 व 2019 के मतदान प्रतिशत और पार्टियों के वोट शेयर को लेकर संभावित परिणामों का अंदाजा लगा रहा है तो कोई अब भाजपा और कांग्रेस की रैलियाें और जनसभाओं में आने वाली भीड़ की गिनती करने में लगा हुआ है। भले ही चुनाव परिणाम से पूर्व किए जाने वाले किसी भी सर्वे और आकलन का कोई औचित्य न सही लेकिन यह सब अब तक के सभी चुनावों में होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। 553 सदस्यीय लोकसभा के लिए अब तक 190 सीटों पर चुनाव हो चुका है जो एक तिहाई से अधिक है। चुनावी हवा को समझने का प्रयास सभी राजनीतिक दल भी अपने—अपने इंटरनल स्रोतों के जरिए कर रहे हैं। एनडीए और इंडिया गठबंधन के नेताओं को इस हवा का बखूबी आभास हो चुका है। भले ही अन्य कोई भी इस हवा का रुख भांप पाने में नाकाम रहा हो। खास बात यह है कि इन दोनों ही गठबंधनों के नेताओं के हाव—भाव और भाषा बोली तथा मुद्दों पर गौर किया जाए तो बड़ी आसानी से यह समझा जा सकता है कि चुनाव का रुख किधर जा रहा है। भाजपा के स्टार प्रचारक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव की शुरुआत अबकी बार 400 पार के नारे और उद्घोष के साथ की थी और दूसरे चरण के मतदान से पहले ही उसकी अनुगूंज पूरी तरह से गुम हो चुकी है। अब कोई भी भाजपा नेता जनता से जनसभाओं में न जनता से आश्वासन लेते दिख रहा है न ही यह नारा लगवाते दिख रहा है। यही नहीं इन भाजपा नेताओं द्वारा अब जनसभाओं में अपने कार्यकाल की 10 साल की उपलब्धियाें का भी जिक्र सिर्फ नाम मात्र के लिए ही किया जा रहा है। खुद प्रधानमंत्री मोदी अब अपनी जनसभाओं में कांग्रेस के घोषणा पत्र पर ही बात करते हुए हिंदू मुस्लिम और सोना चांदी तथा मंगलसूत्र पर ही भाषण देते दिख रहे हैं। खास बात यह है कि एक समुदाय विशेष की बात करते हुए वह उन्हें घुसपैठिये तक कहने से नहीं चूक रहे है। यही नहीं वह किसी महंगाई बेरोजगारी और गरीबी के मुद्दों पर बात करने की बजाय कांग्रेस सरकारों ने कब क्या किया था और पूर्व में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी तथा मनमोहन सिंह ने कब क्या किया या कहा जनता को यह समझाने में लगे हुए हैं। आम जनता की समस्याओं से इन सवालों का क्या सरोकार है यह भी अब भाजपा नेताओं को समझ नहीं आ पा रहा है। खास बात यह है कि जनता के बीच भाजपा नेताओं द्वारा झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाने के प्रयास में भाजपा नेता खुद इतने एक्सपोज हो चुके हैं कि उनके भाषणों को गंभीरता से सुनना तो दूर उनका लोग मजाक बना रहे हैं। देश ही नहीं विदेशी मीडिया तक में वह चर्चा का विषय बन चुके हैं। इस चुनाव में जो सबसे अहम बात है वह है मोदी के मैजिक का खात्मा। मोदी है तो मुमकिन है वाली भाजपा के लिए अब मोदी जीत की गारंटी नहीं रहे हैं। और तो और आम लोगों में अब मोदी से बेहतर योगी हो चुके हैं आने वाले दौर के चरणों में भाजपा अगर इस हवा का रुख नहीं समझ सकी या रुख नहीं बदल सकी तो उसे इस चुनाव में जबरदस्त नुकसान हो सकता है। इसका कितना लाभ या नुकसान किसे मिलता है यह तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे



