विपक्ष अपने गिरेबान में झांके

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10 साल पहले मोदी के नेतृत्व में जब भाजपा ने केंद्र की सत्ता संभाली थी तब एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बच्चों से संवाद कर रहे थे उन्होंने एक बच्चे से पूछा था कि तुम क्या बनना चाहते हो तो बच्चे ने तपाक से कहा था प्रधानमंत्री। तब मोदी के मुंह से अनायास ही यह शब्द निकले थे कि बेटा 15 साल तो भूल ही जाओ। शायद प्रधानमंत्री भी उस समय यह भूल गए थे कि वह किसी नेता से वाद—विवाद नहीं कर रहे हैं एक मासूम बच्चे से बात कर रहे हैं जो आगामी 15 वर्षों में चुनाव में जाने योग्य भी नहीं होगा। लेकिन उनका यह कथन न सिर्फ मोदी की महत्वाकांक्षा और उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचायक ही है जो आज वर्तमान में वह अपनी तीसरी पाली की तैयारी में ही नहीं जुटे हैं बल्कि आत्मविश्वास से इतने भरपूर है कि उन्हें और उनकी पार्टी बीजेपी को चुनाव से पहले ही यह पक्का विश्वास हो चुका है कि 2024 के आम चुनाव में उनकी जीत और मोदी का अगले 5 साल के लिए प्रधानमंत्री बनना तय है। भले ही राजनीति और क्रिकेट कितनी भी अनिश्चितता भरा खेल क्यों न हो लेकिन भाजपा और मोदी जिनको लेकर कहा जाता है कि मोदी है तो मुमकिन है, मुमकिन ही नहीं उनके लिए यह टास्क अत्यंत आसान बना चुका है। मोदी ने सत्ता में आने के बाद देश की राजनीति की नीति और रीति को ही बदलकर रख दिया है। इससे पहले कभी देश के लोगों ने यह नहीं देखा था कि एक प्रधानमंत्री किसी भी राज्य के विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी खुद पार्टी का स्टार प्रचारक बनकर संभाले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जो पिछले 10 सालों से सिर्फ यह ही कर नहीं रहे हैं बल्कि किसी भी चुनाव में जीत की गारंटी बन चुके हैं। अभी हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। मोदी और अमित शाह ने देश की राजनीति के चेहरे मोहरे को ही नहीं बदला है बल्कि उन्होंने भाजपा के चाल चरित्र को भी पूरी तरह बदल दिया है। ब्यौवृद्ध नेताओं को मार्गदर्शकों की सूची में डालने के लिए जाने जाने वाली भाजपा के अंदर एक भी नेता इतनी हिम्मत और साहस नहीं कर सकता है जो यह करना तो दूर यह कह भी नहीं सकता है कि मोदी की उम्र अधिक हो चुकी है उन्हें अब पार्टी का मार्गदर्शक बना दिया जाए। मोदी ने अपनी राजनीति के 10 सालों में विपक्ष की ताकत को लगभग शून्य कर दिया है। उन्होंने जब देश की सत्ता संभाली थी तब भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत का एक नारा उछाला था। कांग्रेस ही नहीं तब देश के लोगों को यह एक मजाक जैसी बात लगी थी। कांग्रेस क्योंकि देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी है तथा उसने अपने जीवन काल में तमाम तरह के उतार—चढ़ाव देखे हैं अनेक बार वह घने काले अंधकार को चीरकर फिर और अधिक सशक्त बनकर उभरती रही है लेकिन इस बार वह अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सिर्फ संघर्ष करती ही दिख रही है। सत्ता सुख की आदी रही कांग्रेस के आधे नेता सालों के इंतजार के बाद कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा के पाले में चले गए हैं वही जो बाकी बचे हैं वह या तो उस मिस कारतूस की तरह है जो अब धमका पाने के काबिल भी नहीं बचे हैं या फिर वह सड़कों पर उतरकर सिर्फ भाजपा के खिलाफ धरने प्रदर्शन और पुतला दहन करने की राजनीति तक ही सीमित रह गए हैं। ऐसी स्थिति में अकेले राहुल गांधी जो अपनी पद यात्राओं से मोहब्बत की दुकान चलाने की कोशिश कर रहे हैं वह भी कामयाब होती नहीं दिख रही है। हालात ऐसे अजब गजब हो चुके हैं कि कांग्रेस की तो बात ही छोड़िए पूरा विपक्ष मिलकर भी भाजपा के मुकाबले में असमर्थ दिखाई दे रहा है और उनका यह गठबंधन इंडिया भी सहयोगी दलों के निजी स्वार्थो की भेंट चढ़ता दिख रहा है। कल संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर के महानिर्वाण दिवस पर तमाम दलों के नेता जब उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे तो वह जरूर इस बात को सोच रहे होंगे कि उन्होंने भारत के लोकतंत्र का जो विधान बनाया था उसमें तो कहीं एक दलीय सत्ता के अखंड साम्राज्य को शामिल नहीं किया गया था तो फिर यह कैसे संभव हो गया? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए विपक्षी दलों के नेताओं को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है।

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