बातें ज्यादा काम कम

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उत्तराखंड की चार धाम यात्रा में अव्यवस्थाओं का मुद्दा इन दिनों खबरों के केंद्र में बना हुआ है। दूून से लेकर दिल्ली तक इसे लेकर हंगामा मचा हुआ है। खास बात यह है कि चार धाम यात्रा की व्यवस्थाओं को लेकर मुख्यमंत्री और पर्यटन मंत्री द्वारा जो बड़ी—बड़ी बातें और दावे किए गए थे उनकी हकीकत चंद दिनों में ही सामने आ गई है। यह सच है कि सत्ता में बैठे लोगों ने धरातल पर इस यात्रा की तैयारियां ठीक से की गई होती तो आज सरकार की इस तरह से किरकिरी भी नहीं होती और न यात्रियों को उस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता जैसी वह समस्याएं झेल रहे हैं। यात्रा शुरू होने से 4 दिन पूर्व यात्रा मार्गों का स्थलीय निरीक्षण करने के बाद पर्यटन मंत्री ने अपनी समीक्षा बैठक में अधिकारियों से नाराजगी जताई गई थी लेकिन क्या इससे व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जा सकता था? सीएम हेलीकॉप्टर से केदारधाम जाकर निर्माण कार्यों का निरीक्षण कर आए और मुख्य सचिव भी केदारधाम घूम आये। क्या यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए यही काफी था। चार धामों तक यात्री कैसे पहुंचेंगे? परिवहन की कैसी व्यवस्था है। यात्रा मार्गों पर बने यात्री पड़ावों में क्या सुविधाएं हैं और क्या नहीं है? धामों में यात्रियों के ठहरने के क्या इंतजाम हैं? सड़कों की क्या स्थिति है तथा स्वास्थ्य सेवाओं और आपात स्थिति से निपटने के क्या इंतजाम हैं? इन्हें समय रहते हुए दुरुस्त करना तो दूर की बात है इन्हें देखने समझने की जरूरत भी किसी ने नहीं समझी। चार धाम यात्रा मार्गों पर बने यात्री पड़ावों पर शौचालय और पेयजल तक कि अगर व्यवस्था नहीं है तो बाकी किसी और सुविधा की तो बात ही क्या की जाए। शासन—प्रशासन को यह बखूबी पता था कि दो साल बाद होने जा रही चार धाम यात्रा में इस साल श्रद्धालुओं की संख्या अधिक रहेगी। सीएम यात्रा के ऐतिहासिक होने की बात तो करते रहे लेकिन क्या इस ऐतिहासिक यात्रा के लिए उन्होंने ऐतिहासिक इंतजाम भी किए। भले ही सूबे में भाजपा नेता बातें कम और काम ज्यादा का नारा बुलंद करते रहे हो लेकिन हकीकत यह है कि वह सिर्फ बातें ही करते रहे हैं उन्होंने काम बिल्कुल भी नहीं किया है। धामों में पहुंचने वाले यात्री खुले आसमान के नीचे राते काटने पर मजबूर हैं जबकि यहां कड़ाके की सर्दी पड़ रही है ऐसे में अगर यात्री मरेंगे नहीं तो क्या होगा? चार धाम जाने वाले यात्री बड़ी संख्या में बीमार हो रहे हैं और इलाज न मिल पाने के कारण उनकी जान जा रही है। केंद्र सरकार अब यात्रियों की सुरक्षा के लिए अगर आईटीबीपी और एनडीआरएफ तथा सेना की मदद ले रही है तो यह सरकार की एक बड़ी नाकामी है। राज्य में अगर इस समय कांग्रेस की सरकार रही होती तो सत्ता में बैठे यही भाजपा नेता आज 100 सवाल खड़े कर रहे होते जो अब खामोशी के साथ व्यवस्थाओं के सुधरने का इंतजार कर रहे हैं। खराब मौसम ने यात्रियों की समस्याओं को और भी बढ़ा दिया है लेकिन यह कोई नई बात नहीं है यात्रा सीजन में कई बार इस तरह मौसम की मार आम बात है। इसकी आड़ में सरकार अपनी नाकामी को नहीं छुपा सकती है।

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