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राहुल को सजा का संदेश

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बीते कल गुजरात (सूरत) की एक अदालत द्वारा 2019 के एक मानहानि से संबंधित मामले में कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को 2 साल की सजा सुना दी गई। 2013 के बाद बदली गई कानूनी व्यवस्था के तहत 2 साल या इससे अधिक की सजा होने पर किसी भी व्यक्ति की राज्यसभा, लोकसभा व विधानसभा की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है तथा वह व्यक्ति अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य माना जाता है। भले ही अदालत द्वारा उनकी सजा पर अभी 30 दिन का स्थगन आदेश देते हुए इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील का मौका दिया है तथा उन्हें जमानत भी दे दी गई है किंतु इस अति गंभीर मामले को लेकर देश का समूचा विपक्ष तो राहुल गांधी के समर्थन में उतर ही आया है साथ ही कांग्रेसी नेता भी सड़कों पर आ गए हैं। दरअसल यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ईडी और सीबीआई के छापों और विपक्षी दलों के नेताओं की गिरफ्तारियां और उन्हें जेल भेजे जाने का मामला पूरे शबाब पर है। राहुल गांधी की सियासत को समाप्त करने के लिए उनके लंदन में दिए गए बयान को लेकर सत्तापक्ष माफी मांगने पर अड़ा है तथा संसद को नहीं चलने दे रहा है वही अदाणी पर आई हिंडनवर्ग की रिपोर्ट पर विपक्ष जेपीसी की मांग कर रहा है। भले ही आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने या अन्य आपराधिक मामलों में कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा के कारण जयललिता, आजम खान और लालू यादव व रशीद मसूद जैसे नेताओं की राज्यसभा, लोकसभा व विधानसभा की सदस्यता चली गई हो लेकिन राहुल गांधी का यह पहला मामला होगा जब आपराधिक मानहानि के मामले में किसी सांसद की सदस्यता जाएगी। कांग्रेस अगर इसे बदले की या प्रतिशोध की राजनीति मान रही है तो वह बेवजह नहीं है। आम लोगों की सोच भी यही है। चुनावी सभा में 4 साल पहले ललित मोदी और नीरव मोदी के नामों का जिक्र करते हुए अगर राहुल गांधी ने यह पूछ लिया कि चोरों के सरनेम मोदी ही क्यों होते हैं यह कोई ऐसा अपराध नहीं है जिसके लिए देश के किसी नेता को इस तरह की सजा दी जाए? वर्तमान दौर की राजनीति में तमाम नेताओं के द्वारा आए दिन तमाम तरह की अमर्यादित टिप्पणियंा दूसरे नेताओं के बारे में सड़कों से लेकर सदन तक की जाती रहती है। मारपीट, गाली—गलौज और हाथापाई वर्तमान राजनीति की संस्कृति बन चुका है। लेकिन यह वर्तमान के नए भारत की नई राजनीति है जो धीरे—धीरे अराजक अंत की ओर बढ़ रही है। आज देश के 14 विपक्षी दलों द्वारा ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं के केंद्रीय सत्ता द्वारा दुरुपयोग के मामले को लेकर देश की सर्वाेच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया गया तो इसे कोई बेवजह भला कैसे मान सकता है। इन एजेंसियों द्वारा कई—कई दिनों तक सैकड़ों घंटे लंबी पूछताछ के क्या मायने हैं? देश ने 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी को देश में इमरजेंसी लागू करने और सत्ता के खिलाफ बोलने वालों को जेलों में ठूसते देखा है। देश के लोकतंत्र और सामाजिक व्यवस्था के साथ जब भी खिलवाड़ हुआ उसका स्वरूप और निखर कर सामने आया है। देखना यह है कि वर्तमान की राजनीति जो अति की सीमाएं तोड़ने पर आमादा है उसका अंत कब और कैसा होगा। हां कोर्ट का यह फैसला देश के नेताओं को यह संदेश भी देता है कि उन्हें बोलने से पहले यह जरूर सोचना चाहिए कि बोलने की क्या मर्यादांए हैं। जिसकी लाठी उसकी भ्ौंस वाली राजनीति न देश हित में ठीक है न समाज हित में अच्छी है।

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