दरकती दीवारों के सुलगते सवाल

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दरकती दीवारें और जमीन में पड़ी दरारें इस बात की गवाही दे रही हैं कि जो लोग जोशीमठ में हालात सामान्य होने या नियंत्रण में होने की बात कर रहे हैं वह झूठ बोल रहे हैं। जोशीमठ का संकट दिनोंदिन और गंभीर होता जा रहा है तथा बीते 3 सप्ताह में अब इसका दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि यह कहना कतई भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इस संकट ने पूरे शहर जोशीमठ को अपनी जद में ले लिया है। इन 3 सप्ताह में केंद्रीय संस्थानों की तमाम टीमें जो शोध कार्यों में जुटी हुई हैं वह भी अभी तक न तो आपदा के कारणों तक पहुंच सकी हैं और न उन्हें इस संकट के कोई निवारण का रास्ता सूझ रहा है। राज्य का शासन प्रशासन चंद प्रभावित परिवारों को थोड़ी बहुत आपदा राहत देकर इस बात की उम्मीद लगाए बैठा है कि हालात खुद ही सामान्य हो जाएंगे। या यह भी कहा जा सकता है कि वह इस आपदा के मुकाबले में स्वयं को असमर्थ पा रहा है इसलिए रामभरोसे बैठना उसकी मजबूरी हो गया है। जोशीमठ के वास्तविक हालात यह है कि न सिर्फ बहूमंजिले होटल और आवासीय कालोनियां इसकी जद में आ चुकी है अपितु ऐतिहासिक ज्योर्तिमठ का भवन बल्कि पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस से लेकर जीएमवीएन का वह गेस्ट हाउस जिसे शोध टीमों और अधिकारियों ने अपनी पनाहगाह बना रखा था उसकी दीवारें भी दरकने लगी है जोशीमठ के अभी भले ही 849 भवनों में दरारे आने की बात कही जा रही हो लेकिन सच यह है कि जिन भवनों मेंं अभी किसी तरह की क्षति नहीं हुई है वह भी अब सुरक्षित नहीं माने जा रहे हैं। आपदा का दायरा जिस गति से बढ़ रहा है वह कभी भी विकराल रूप ले सकता है। जैसा कि मौसम विभाग द्वारा कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में भारी बारिश और बर्फबारी से यह समस्या गंभीर रूप ले सकती है। आपदा को लेकर प्रारंभिक दौर में सरकार ने अलग जोशीमठ बनाने और प्रभावितों के विस्थापन या उन्हें घर बनाकर देने की बात की गई थी लेकिन 4 दिन बाद ही उसने अपने इस फैसले से हाथ खींच लिया था वही प्रभावित मकानों के ध्वस्तिकरण को लेकर भी यही हुआ था। पहले सभी मकानों को तोड़ने की बात कही गई लेकिन जब लोगों द्वारा पहले मुआवजा देने की मांग की गई बाद में ध्वस्तिकरण करने पर लोग अड़ गए तो सरकार ने भी अपने कदम पीछे खींच लिए और कहा गया कि सरकार किसी का घर नहीं तोड़ेगी लेकिन अब फिर क्षतिग्रस्त भवनों को ढहाने की बात कही जा रही है। दरअसल यह दो कदम आगे और फिर 4 कदम पीछे वाली स्थिति इसलिए बनी हुई है क्योंकि सरकार को खुद भी नहीं पता है कि उसे क्या करना है या करना चाहिए? सवाल यह है कि क्या इसी तरह बचाया जा सकेगा जोशीमठ? सरकार के सामने अब एक पूरे शहर के विस्थापन की समस्या मुंह बाए खड़ी है यहां व्यापारिक प्रतिष्ठानों और सरकारी भवनों को छोड़ दे तो लगभग 4445 घर पंजीकृत हैं जिनमें लगभग 10 से 20 हजार की आबादी रहती है और अकेला जोशीमठ ही नहीं है जहां विस्थापन की जरूरत है गोपेश्वर और टिहरी तथा चंबा आदि में भी बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित करने की जरूरत है। राज्य सरकार के पास अपने संसाधन है नहीं और केन्द्र से कितनी मदद मिलती है और कब मिलेगी इसका अभी पता नहीं है ऐसे में जोशीमठ का संकट कैसे हल होगा यह भगवान ही जान सकता है।

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