आखिर कब सबक लेंगे हम?

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देश और प्रदेश के लिए जोशीमठ की क्या महत्व है? उसका इतिहास—भूगोल क्या है? यह तमाम सवाल अब पीछे छूट चुके हैं। आज हर किसी के जेहन में बस एक ही सवाल है कि क्या जोशीमठ का अस्तित्व बच सकेगा? जोशीमठ में आज जो कुछ हो रहा है उसके क्या कारण हैं? क्या इस आपदा का कोई प्रभाव सिर्फ जोशीमठ तक ही सीमित रहेगा या फिर जोशीमठ की तरह उत्तराखंड के अन्य शहरों और क्षेत्रों को भी इसी तरह की आपदा से दो—चार होना पड़ेगा? उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पहाड़ों पर मैदानों की तर्ज पर तेज विकास की शुरुआत करने वालों ने अगर भौगोलिक परिस्थितियों की भिन्नता को भी समझने की कोशिश की होती तो शायद इस तरह का अनियोजित विकास पहाड़ में न हुआ होता। आज मुख्यमंत्री धामी बार—बार जिस इकोलॉजी व इकोनॉमी के संतुलन बनाए रखने का फॉर्मूला पेश कर रहे हैं उस पर बीते सालों में न तो केंद्र सरकार द्वारा कभी गौर किया गया और न राज्य सरकार ने कभी इस पर ध्यान दिया। विकास की अंधी दौड़ और सत्ता की भूख में राज्य में वह सब धड़ल्ले से होता रहा है जो कदाचित नहीं होना चाहिए था। बीते 20 सालों में विकास के नाम पर जिस तरह पहाड़ों को थोड़ा—फोड़ा गया है और पेड़ों को काटा गया है वह किसी से भी छिपा नहीं है। उत्तराखंड के भविष्य और उसकी भौगोलिक स्थिति परिस्थितियों पर भूवैज्ञानिक और साइंटिस्ट्स व पर्यावरणविद्वो द्वारा किए गए अध्ययनों और सर्वे की रिपोर्ट को भी कभी किसी ने कोई तवज्जो नहीं दी। बस तेज विकास सभी की चाहत बनकर रह गया। सवाल यह है कि इन 20 सालों में जो कुछ विकास के नाम पर होता आया है अगर वही क्रम अगले 20 साल और जारी रहा तब क्या होगा? 2013 की केदारनाथ आपदा के वह गहरे जख्म जिनके बारे में आज ही यह कहा जाता है कि पता नहीं मरने वाले कितने लोग थे, तब फिर आखिर वह कौन सी आपदा होगी जो हमें सतर्क कर पाएगी? आज जब जोशीमठ पर संकट मंडरा रहा है तो इसे तमाम लोग भावी भविष्य के लिए खतरे की घंटी बताकर यह कह रहे हैं कि अभी भी अगर सतर्क नहीं हुए तो भविष्य के परिणाम अत्यंत ही घातक होंगे। लेकिन यह बातें सिर्फ तभी तक कहीं और सुनी जा रही हैं जब तक यह संकट है। केदारनाथ आपदा से निपटने व शवों की तलाश करने के लिए सालों तक चले बचाव राहत के बाद भी जिस तरह इस आपदा को भुला दिया गया और हम केदारपूरी के नवनिर्माण में जुट गए ठीक इसी तरह आने वाले समय में इस जोशीमठ आपदा को भी भूल कर हम नए जोशीमठ के निर्माण में जुट जाएंगे। क्योंकि हमें पीछे मुड़ कर देखने की आदत नहीं है लेकिन जो समाज इतिहास से सबक नहीं लेता वह समाज समाप्त हो जाता है या संकटों से घिरा रहता है यह भी एक कटु सत्य है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार अब उत्तराखंड के भावी भविष्य के लिए किस तरह की नीतियों का निर्धारण करते हैं यह आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो सबकी नजरें आपदा प्रभावितों की जीवन सुरक्षा और जोशीमठ का अस्तित्व बचाने पर लगी हुई है। जो आज की पहली जरूरत भी है जितनी जल्द हो सके आपदा प्रभावित क्षेत्र को खाली कराया जाना चाहिए और प्रभावितों को सुरक्षित स्थान पर शरण दी जानी चाहिए। क्योंकि आपदा प्रभावितों की समस्याएं और परेशानियां अत्यंत ही गंभीर है।

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