तीर्थ पुरोहितों की तानाशाही

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चार धाम यात्रा को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए सरकार द्वारा हर संभव व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं। किसी भी धाम में एक दिन में कितने यात्री ठहर सकते है,ं कितने यात्री दर्शन कर सकते हैं, कितने यात्रियों की भोजन—स्नान और शौच आदि की व्यवस्था संभव है उसकी एक सीमा निर्धारित है। इसीलिए सरकार द्वारा हर दिन एक निश्चित संख्या में तीर्थ यात्रियों को चारधाम में पहुंचने की व्यवस्था की गई है लेकिन चार धामों के तीर्थ पुरोहितों को सरकार का यह फैसला अच्छा नहीं लग रहा है। सवाल यह है कि क्या तीर्थ पुरोहितों को सिर्फ इस बात से ही सरोकार है कि जितने अधिक यात्री होंगे उतनी अधिक आय होगी। असीमित संख्या में अगर किसी धाम में श्रद्धालु पहुंचेंगे तो क्या इससे अवस्थाएं नहीं फैलेगी? अगर केदारनाथ धाम में सरकार ने एक दिन में 12 हजार श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था की है और 20 हजार लोग पहुंच जाते हैं तो क्या स्थिति होगी, क्या इन अतिरिक्त 8 हजार लोगों के रहने—खाने की व्यवस्था तीर्थ पुरोहित करेंगे या असीमित संख्या में लोगों के आने से सड़कों पर जाम लग जाता है तो उसे खुलवाने के लिए तीर्थ पुरोहित कुछ कर सकेंगे? जितनी ज्यादा भीड़ होगी अवस्थाएं फैलने की संभावनाएं उतनी ही ज्यादा होगी। अभी बीते दिनों वैष्णो देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की अधिक भीड़ के कारण क्या हुआ था हम सभी जानते हैं। होटल व्यवसाई भी यात्रियों की संख्या सीमित करने से नाराज हैं, वह पर्यटन मंत्री के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। ट्रांसपोर्ट कंपनियां भी नाराजगी जता रही है।
दरअसल दो साल बाद शुरू हो रही इस यात्रा से अब सबको अपनी अपनी कमाई की चिंता है कि कैसे अधिक से अधिक कमाया जाए। अधिक संख्या में श्रद्धालु होंगे तो होटल किराए से लेकर खाने पीने की वस्तुओं पर मनमानी वसूली हो सकती है, वही किराया भी मनमाना वसूला जा सकता है। बात चाहे तीर्थ पुरोहितोंं की हो या फिर यातायात व होटल व्यवसायियों की, सभी बस अपनी कमाई की सोच रहे हैं उनकी सोच में यात्रियों की समस्याएं अथवा अव्यवस्थाओं से पैदा होने वाले संकट की बात दूर—दूर तक नहीं है। त्रिवेंद्र सरकार द्वारा लाए गए देवस्थानम बोर्ड को भंग कराने में सफल हो चुके तीर्थ पुरोहित अब अपनी तानाशाही पर उतर आए हैं उनकी सोच है कि चारधाम यात्रा से जुड़े सभी नीतिगत फैसले भी सरकार उनसे पूछ कर करें। क्या करना है क्या नहीं तीर्थ पुरोहितों की राय लेकर ही किया जाए? यह न सिर्फ उनकी गलत सोच है बल्कि ऐसा संभव ही नहीं है अगर कोई अनहोनी होती है तो उसके लिए तीर्थ पुरोहित नहीं सरकार जिम्मेदार होगी? फिर सरकार तीर्थ पुरोहितों द्वारा किसी काम के लिए बाध्य कैसे हो सकती है।

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