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जेब पर दोहरी मार

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महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी के लिए पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी किसी नए आर्थिक संकट से कम नहीं है। पेट्रोल पांच रुपये महंगा होने और डीजल के दामों में उछाल का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा संबंध रसोई के बजट, बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की कीमतों, खेती की लागत और आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से है। ईंधन महंगा होता है तो परिवहन महंगा होता है, परिवहन महंगा होता है तो जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ने का दबाव बनता है। इस तरह पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी महंगाई की उस श्रृंखला को गति दे सकती है, जिसका सबसे अधिक बोझ पहले से सीमित आय में गुजारा करने वाले परिवारों पर पड़ता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि महंगाई के इस दबाव से आम आदमी को राहत कैसे मिलेगी? सरकारें विकास, निवेश और आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती हैं, लेकिन आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ तभी है, जब उसका लाभ आम नागरिक की जिंदगी में दिखाई दे। यदि आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही और दूसरी ओर रोजमर्रा की जरूरतें लगातार महंगी हो रही हैं, तो विकास के दावों और आम आदमी की आर्थिक स्थिति के बीच अंतर बढ़ना स्वाभाविक है। पेट्रोल और डीजल केवल ईंधन नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार तय करने वाले प्रमुख कारक हैं। बसों, ट्रकों, मालवाहक वाहनों और कृषि कार्यों में डीजल की महत्वपूर्ण भूमिका है। डीजल महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ने की आशंका रहती है। इसका असर सब्जियों, फलों, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। किसान पहले ही बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी जैसी लागतों का सामना करते हैं। ऐसे में डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी उनकी उत्पादन लागत को और बढ़ा सकती है। यदि बढ़ी हुई लागत का उचित मूल्य किसान को नहीं मिलता, तो नुकसान खेती करने वाले को उठाना पड़ता है। दूसरी ओर, लागत का बोझ उपभोक्ता तक पहुंचता है तो घर का बजट बिगड़ता है। इस पूरे समीकरण में सबसे कमजोर स्थिति उस मध्यमवर्गीय परिवार की है, जिसकी आमदनी का बड़ा हिस्सा मकान का किराया, बच्चों की शिक्षा, इलाज, बिजली-पानी और परिवहन पर खर्च हो जाता है। उसके पास महंगाई से निपटने के विकल्प सीमित हैं। निजी वाहन से कार्यालय जाने वाला कर्मचारी ईंधन का खर्च घटाने के लिए अपनी आवाजाही सीमित कर सकता है, लेकिन आवश्यक यात्राएं तो करनी ही पड़ती हैं। इसी तरह छोटे कारोबारी और परिवहन संचालक बढ़ी हुई लागत को लंबे समय तक स्वयं वहन नहीं कर सकते। अंततः इसका कुछ हिस्सा वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में जुड़ने की आशंका रहती है। सरकार के सामने भी चुनौती कम नहीं है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों का संबंध अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की विनिमय दर, करों और अन्य लागतों से होता है। इसलिए हर मूल्यवृद्धि का कारण एक ही नहीं माना जा सकता। लेकिन यही कारण है कि सरकार की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उसे कीमतों में बढ़ोतरी के कारणों को पारदर्शी ढंग से सामने रखना चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को कम करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों को अपने-अपने करों की समीक्षा करने, सार्वजनिक परिवहन को किफायती बनाने और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर निगरानी मजबूत करने जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह भी जरूरी है कि ईंधन की कीमतों को केवल राजस्व जुटाने के साधन के रूप में न देखा जाए। पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले कर सरकारों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन इस आय और नागरिकों की क्रयशक्ति के बीच संतुलन बनाए रखना भी शासन की जिम्मेदारी है। जब महंगाई बढ़ती है, तो कम आय वाले परिवार अपनी जरूरतों में कटौती करने को मजबूर होते हैं। इसका असर बाजार की मांग, छोटे कारोबार और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। इसलिए कीमतों में राहत देना केवल राजनीतिक लोकप्रियता का प्रश्न नहीं, बल्कि आर्थिक संतुलन बनाए रखने का भी विषय है। हालांकि, राहत के नाम पर केवल अस्थायी घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। जरूरत ऐसी नीति की है, जो ईंधन की कीमतों में अनावश्यक उतार-चढ़ाव का दबाव कम करे, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाए और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा दे। दीर्घकाल में तेल पर अत्यधिक निर्भरता कम करना भी जरूरी है। लेकिन इन उपायों के परिणाम आने में समय लगेगा। फिलहाल सवाल उस परिवार का है, जिसे आज अपनी आमदनी में ही महीने का पूरा खर्च निकालना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की सफलता का आकलन केवल बड़ी परियोजनाओं और आर्थिक आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि आम नागरिक की जेब में कितना पैसा बच रहा है और उसकी बुनियादी जरूरतें कितनी आसानी से पूरी हो रही हैं। पेट्रोल पांच रुपये महंगा होने और डीजल के दाम बढ़ने की खबर इसलिए महज मूल्यवृद्धि की सूचना नहीं है, बल्कि यह सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं और जनकल्याण के दावों की परीक्षा भी है। महंगाई का बोझ जब बार-बार आम आदमी पर पड़ता है, तो उसका भरोसा भी प्रभावित होता है। ऐसे में सरकार को केवल बाजार की परिस्थितियों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बचना चाहिए। जरूरी है कि मूल्यवृद्धि के कारणों की स्पष्ट जानकारी दी जाए, करों और राहत के विकल्पों की समीक्षा हो तथा महंगाई की दूसरी लहर को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। आखिर अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल आंकड़ों को बेहतर दिखाना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है। यदि ईंधन महंगा होने से आम आदमी की थाली, यात्रा और आजीविका पर संकट बढ़ता है, तो राहत की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से निभानी होगी।

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