उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में इन दिनों कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। आये दिन बढ़ते क्राइम पुलिस सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिये काफी है। राजधानी में बढ़ते अपराध यह बताते है कि यहंा किसी को भी कानून का कोई खौफ नही है। अगर बात पिछले तीन दिनों की की जाये तो यहंा तीन दिनों में तीन हत्याये हो चुकी है। जिसमें तीनों हत्याये महिलाओं की ही हुई है। राज्य व केन्द्र सरकार महिलाओं की सुरक्षा व उनके लिए इंसाफ के कई दावें करती है क्या यह दावे सही साबित हो रहे है यह पिछले तीन दिनों की घटनाओ से सामने आ चुका है। कानून व्यवस्था चाक चौबंद मामले पुलिस प्रशासन कितना सजग है यह बात बीते शनिवार को विकासनगर क्षेत्र मे हुई मनीषा की हत्या के मामले में सामने आया है। जहंा चार दिन बाद भी हत्यारोपी का नाम जानने के बावजूद पुलिस उसे गिरफ्तार करने में नाकामयाब साबित हुई है। मामले में पुलिस का कहना है कि हत्यारोपी मोबाइल नही रखता था जिस कारण उसकी लोकेशन नहीं ढूंढी जा पा रही है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या पुलिस विभाग मोबाइल के सहारे ही अपराध या अपराधियों को रोक पायेगा? सच तो यह है कि राजधानी के थानो—चौकियों में इन दिनों पीड़ितो की सुनवाई तक नहीं हो रही है। पीड़ितों के तहरीर देने के बावजूद उन्हे उनकी रिसीविंग तक नहीं दी जा रही है। जहंा तक मोबाइल चोरी होने की खबर भी किसी भी थाना—चोैकी की पुलिस को दी जा रही है तो वह मामले को गुमशुदगी में दर्ज कर रहे है। यह कानून व्यवस्था का उपहास उड़ाना नही तो क्या है यह पुलिस के आलाधिकारियों को सोचने की जरूरत है? हम राजधानी नही पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था की बात करें तो पहाड़ों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक में पुलिस की नाक के नीचे ड्रग्स सिंडीकेट से लेकर भू माफिया, शराब माफिया, खनन माफिया, खड़िया माफिया सब कानून का माखौल उड़ाते नजर आ रहे है। ऐसे में सरकार व पुलिस प्रशासन काें ेयह बात सोचने की जरूरत है कि क्या हमारी पुलिस व्यवस्था इतनी लाचार हो गयी है कि अपराधी खुलेआम अपराध कर रहे है और कानून के रखवाले इसे रोकने में नाकामयाब साबित हो रहे है।




