आजादी के अमृत काल में विश्व के सबसे पुराने और बड़े देश की संसद में जो चुनाव सुधारो पर चर्चा हो रही है उसकी जरूरत क्यों पड़ी? यह सवाल इसलिए ज्यादा जरूरी हो गया है क्योंकि चुनाव आयोग सवालों के घेरे में है। वह न निष्पक्ष चुनाव करा पा रहा है न ही विपक्षी दलों के नेताओं की आपत्तियों के जवाब दे रहा है, उनका समाधान तो बहुत दूर की बात है। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष द्वारा मीडिया और चुनाव आयोग को कैप्चर कर लिया गया है। विपक्ष के आरोप इसलिए भी बेबुनियाद नहीं माने जा सकते हैं क्योंकि सत्ता में बैठी भाजपा के नेता ही जब चुनाव से पहले इस बात का ऐलान करते रहे हैं कि विपक्षी नेता चाहे कुछ भी कर ले जीतेगी तो भाजपा ही। स्थिति जब यहां तक पहुंच चुकी हो तब अगर विपक्ष और देश की आम जनता भी यह कह रही हो कि जब भाजपा को ही जीतना है तो फिर इस चुनावी डुगडुगी को बजाने और इस पर करोड़ों करोड़ रुपया खर्च करने की भी क्या जरूरत है सिर्फ यह दिखाने के लिए कि देश में लोकतंत्र है। देश में जिस ईवीएम से चुनाव कराये जा रहे हैं उस पर लंबे समय से सवाल उठाए जा रहे हैं। विश्व के तमाम देश जो ईवीएम से चुनाव कराते थे वहां ईवीएम को हटा दिया गया है। क्योंकि इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आज तक कोई ऐसी मशीन बनी ही नहीं जिसे हैक न किया जा सके। ईवीएम के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की जो फंक्शनिंग होती है उसकी प्रोग्रामिंग का काम इंजीनियर करते हैं इसकी प्रोग्रामिंग के कोड की जानकारी या मशीन की जांच के लिए सत्ता पक्ष या चुनाव आयोग कभी तैयार नहीं होता है। देश की मतदाता सूची में धांधली के तमाम उदाहरण इन दिनों चर्चाओं के केंद्र में है। पूरे देश में आज अगर वोट चोरी का मुद्दा गूंज रहा है तो इस पर विराम लगाने के लिए क्यों चुनाव आयोग जवाब नहीं दे रहा है क्यों हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक याचिकाओं के अंबार लगे हुए हैं। बीते कुछ दिनों से केंद्र सरकार और चुनाव आयोग द्वारा जो एसआईआर कराया जा रहा है उस पर इतने गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि फर्जी नाम मतदाता सूची में जोड़े जाने मृत बताकर नाम काटे जाने वाले लोग अदालत में कतार लगाकर खड़े हैं और अपने जिंदा होने के सबूत दे रहे हैं। चुनाव आयोग जिसकी नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव कर सरकार ने अपना एकाधिकार हासिल कर लिया है तथा चुनाव आयोग के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सके इसका पुख्ता इंतजाम किया जा चुका है तो ऐसी स्थिति में देश में निष्पक्ष चुनाव क्या संभव हो सकते हैं? चुनाव से पूर्व अधिकारियों की तैनाती से लेकर कौन वोट डालने जाएगा और कौन नहीं जाने दिया जाएगा जब सब कुछ सत्ता में बैठे लोगों को ही तय करना है तो फिर चुनाव आयोग का लेवल प्लेयिंग फील्ड का दावा भला कैसे सच हो सकता है। अखिलेश यादव ने इस चर्चा में रामपुर सीट पर लोकसभा के बाय इलेक्शन का उदाहरण देकर पूछा कि चुनाव आयोग के सामने तमाम शिकायतें रखने और साक्ष्य पेश करने के बाद एक भी मामले में कार्रवाई न किया जाना हैरान करने वाला है। उन्होंने कहा कि मीडिया भी सिर्फ सत्ता पक्ष की ही कवरेज करता है। लोग कहते हैं आप तो टीवी में आते ही नहीं आते भी है तो थोड़ी देर में ही चले जाते हैं और वह आते हैं तो जाते ही नहीं। खैर मीडिया इस दौर में वह मीडिया रहा ही नहीं है जिसका काम विपक्ष के सवालों को ही तवज्जो देना होता था अब बदले दौर में मीडिया भी सत्ता का हो गया और वह विपक्ष के साथ सत्ता पक्ष जैसा ही व्यवहार करता दिखता है। चुनाव में सभी दलों और नेताओं के समान कवरेज मिलनी चाहिए इसकी व्यवस्था चुनाव आयोग को करनी चाहिए जिसे कभी ध्यान दिया ही नहीं जा रहा है। कांग्रेस के नेता मनीष तिवारी, सपा नेता अखिलेश यादव ने इस चर्चा में जो भी मुद्दे उठाए हैं वह कोई हवा हवाई नहीं है वर्तमान सरकार और निर्वाचन आयोग की कार्य प्रणाली पर न सिर्फ गंभीर सवाल खड़े करते हैं बल्कि चुनाव को कंडम साबित करने वाले हैं। इस चर्चा में सरकार इन सवालों का कोई तार्किक उत्तर देगी या पाएगी अथवा उनके द्वारा जो चुनाव सुधार के उपाय सुझाए गए हैं उन पर कोई बड़ा फैसला लेने का साहस कर सकेगी इसकी उम्मीद नहीं है। इसलिए इस मंथन में संसद का समय भी बेकार जाया किया जा रहा है।




