आजादी के अमृत महोत्सव पर जवानों और किसानों को सलाम

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देश आज आजादी का 75 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आज के दिन को भारत सरकार द्वारा आजादी का अमृत महोत्सव का नाम दिया गया है। हर बार की तरह इस अवसर पर हमने आजादी के इतने दशकों में क्या किया और क्या नहीं किया जाना चाहिए था, पर मंथन हो रहा है। उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन असफलताओं और नाकामियों से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। आजादी के बाद के दशकों में देश ने हरित क्रांति, श्वेत क्रांति व औघोगिक क्रांति के इतिहास रचे हैं लेकिन इसके बाद भी सामाजिक असमानता, भूख और गरीबी से देश को मुक्ति नहीं मिल पाना हमें यह सोचने पर विवश करता है कि यह कैसी स्वतंत्रता और कैसा विकास है? हालांकि बीते दो—तीन वर्षों से कोरोना के चलते भारत सरकार द्वारा गरीबों को मुफ्त खाघान्न वितरित किया जा रहा है। लेकिन देश की 23 फीसदी आबादी के पास आज भी न रहने को घर है न खाने को भरपेट भोजन और न तन ढकने को कपड़े। खाघान्न उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाने वाला और देश में दूध घी की नदियां बहाने वाला किसान आज भी विवश क्यों है? देश का गरीब और मजदूर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद भी गरीब ही क्यों बना हुआ है? जब देश आजाद हुआ था तब यही सोचा गया था कि विदेशी शोषण के कारण ही इसका मुख्य कारण था, अब इन तमाम समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी। आजं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का मान सम्मान बढ़ा है लेकिन सामाजिक समस्याएं और अधिक विकराल क्यों हो गई हैं। देश के नेता सामाजिक न्याय और सबका साथ सबका विकास की बात तो करते हैं लेकिन क्यों आज तक देश वहां तक नहीं पहुंच सका चिंतनीय सवाल है। आजादी के बाद देश में जाति—धर्म और क्षेत्र के आधार पर की जाने वाली विभाजन कारी राजनीति की शिकार जनता को शोषण और अन्याय से मुक्ति कब मिलेगी? क्यों इन नेताओं द्वारा कभी गौर नहीं किया जाता। आजादी की लड़ाई कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले देश के हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाईयों के बीच आज जो असहिष्णुता का माहौल बना हुआ है क्या वही हमारी आजादी की उपलब्धता है या फिर गरीब और अमीरों के बीच बढ़ती खाई हमारा विकास है? राजनीति का उद्देश्य जब सिर्फ सत्ता हासिल करना मात्र बन जाता है तब सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों का पीछे छूट जाना स्वाभाविक है। इस स्वतंत्र दिवस के अमृत महोत्सव पर देश की सुरक्षा के लिए शहादत देने वालों को नमन और उनकी बात करना भी इसलिए जरूरी है क्योंकि देश के नेताओं द्वारा इसे भी अब राजनीतिक मुद्दा बनाना शुरू कर दिया गया है जो दुखद है। देश के सपूतों की शहादत का बदला दुश्मनों से हर हाल में लिया जाना चाहिए, देश के नेताओं को हर जवान की जान का मूल्य समझने की जरूरत है। क्योंकि इस देश का भविष्य जवानों और किसानों पर ही निर्भर करता है।

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