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अर्थव्यवस्था का बंटाधार

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क्या भारतीय अर्थव्यवस्था अत्यंत गंभीर संकट के भंवर में फंस चुकी है अगर देश के अर्थशास्त्रियों की बात पर भरोसा किया जाए तो इस सवाल का जवाब है हां। इस समस्या से जुड़ा हुआ दूसरा अहम सवाल है कि देश के प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के पास कौन से ऐसे आंकड़े थे जिनके आधार पर वह भारत को दुनिया की पांचवी या चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने तथा जल्द तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के दावों के साथ विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत बनाने की जो बातें की जाती रही हैं क्या वह सब कुछ हवा हवाई था? तो अब इसमें कोई संशय रह ही नहीं गया है क्योंकि खुद प्रधानमंत्री मोदी इस गंभीर संकट की बात को स्वीकार कर चुके हैं और राष्ट्रीय हित की दुहाई देते हुए देश की जनता से अपनी जरूरतों में कटौती करने की अपील कर रहे हैं। जाने—माने अर्थशास्त्री घरेलू आय सर्वेक्षण के पहले अध्यक्ष रह चुके सुरजीत भल्ला का इंडियन एक्सप्रेस में छपा हुआ वह लेख जरूर लोगों को पढ़ना चाहिए जिसमें उन्होंने साफ—साफ लिखा है कि भाजपा भले ही चुनाव जीतने में सफल रही हो लेकिन आर्थिक नीतियों और अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर फेल रही है वह साफ कहते हैं कि राष्ट्रवाद के भाषण देकर और भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बताने से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता है देश के ग्रोथ रेट पर अगर नजर डालें तो उसमें बांग्लादेश पहले और इथोपिया जैसे देश दूसरे नंबर पर हैं तथा भारत 4.7 के ग्रोथ रेट के साथ 16वें स्थान पर है वह कहते हैं कि सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बताने वाले झूठ के तमगे को हमें अब उतार कर फेंक देना चाहिए। भल्ला का कहना है कि सरकार की खराब अर्थ नीतियों के कारण यह हालात पैदा हुए हैं। एक साल में डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में 12 प्रतिशत की गिरावट आई है तथा रुपया बीते 7 सालों से लगातार गिर रहा है लेकिन सरकार देश के पास दुनिया का सबसे बड़ा बाजार होने के घमंड पाले हुए हैं। उसे लगता है कि विदेशी निवेशक भारत में निवेश करने के लिए मरे जा रहे हैं साथ ही वह यह भी कहते हैं कि यहां कोई निवेश क्यों करेगा जब सरकार की नीतियां इस तरह की है कि अगर कोई अपना कारोबार बंद करेगा तो उसे अंतरराष्ट्रीय अदालत में जाने से पहले 5 साल तक भारतीय अदालतो में अपना पक्ष रखना पड़ेगा। करोड़ों डालर निवेश करने वाला कोई व्यक्ति 5 साल तक भारत की अदालतों में क्यों खड़ा रहेगा? यही कारण है कि विदेशों से निवेश आ नहीं रहा है और सरकार अब अपने अनस्किल्ड लेबर को कह रही है कि विदेश जाओ और डॉलर कमा कर लाओ। उनका कहना है कि सरकार अभी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सर्जरी के बजाय बैंडेड लगाकर काम चला रही है और आर्थिक संकट और अधिक गंभीर होता जा रहा है। वह इसकी जो चार वजह गिनते हैं उनमें सरकार की गलत नीतियां तथा दूसरी हैं कॉरपोरेट और तीसरी वजह है कांग्रेस का सुस्त विरोध तथा चौथी है डीप स्टेट यानी बाकी तीन किरदारों को अपने ऊपर हावी होने देना। केंद्र सरकार सामाजिक और आर्थिक मामलों में फेल हो चुकी है और उसकी सफलता सिर्फ चुनावी जीतो तक ही सीमित होकर रह गई है। बढ़ती महंगाई व बेरोजगारी के कारण समाज की मुश्किलें बढ़ी है और जैसे—जैसे मुश्किलें बढ़ रही है भाजपा की लोकप्रियता भी घट रही है पश्चिम बंगाल की जीत उसके पीक पर पहुंचने की निशानी है। देश की युवा पीढ़ी अब सरकार की नीतियों के खिलाफ खड़ी होती जा रही है।

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