Home News Posts उत्तराखंड आंगन में मौत, जंगल में शिकारी ‘बेखौफ’

आंगन में मौत, जंगल में शिकारी ‘बेखौफ’

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  • पहाड़ के गांवों में बढ़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष
  • आखिर कब तक गुलदार के हवाले रहेंगे गांव

देहरादून। उत्तराखंड में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष अब गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। इसके पीछे कई कारण हैं। गांवों से लगातार हो रहा पलायन, खेतों का बंजर होना, जंगलों और आबादी के बीच बदलती सीमाएं, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में मानवीय गतिविधियों का विस्तार और भोजन की उपलब्धता में बदलाव जैसे कारक इस संघर्ष को प्रभावित करते हैं।
पहाड़ के अनेक गांवों में कभी गुलजार रहने वाले घर अब खाली पड़े हैं। खेत झाड़ियों में तब्दील हो रहे हैं। आबादी के आसपास वनस्पति का अनियंत्रित विस्तार हो रहा है। ऐसे क्षेत्रों में वन्यजीवों की आवाजाही और मनुष्यों से उनका सामना बढ़ने की आशंका रहती है। गुलदार जैसे वन्यजीवों की अनुकूलन क्षमता भी उन्हें आबादी के नजदीक रहने में सक्षम बनाती है। इसका परिणाम यह है कि इंसान और वन्यजीवों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। हालांकि इस समस्या का पूरा दोष केवल जंगलों या वन्यजीवों पर डालना भी उचित नहीं होगा। असली सवाल वन प्रबंधन, मानव बस्तियों की सुरक्षा और समय रहते जोखिम पहचानने की व्यवस्था का है। जब तक इन पहलुओं पर एक साथ काम नहीं होगा, तब तक घटनाओं के बाद की कार्रवाई से समस्या का समाधान संभव नहीं है।
उत्तराखंड में वन्यजीवों के हमले में किसी व्यक्ति की मौत होने पर मुआवजे का प्रावधान है। लेकिन क्या किसी परिवार के लिए आर्थिक सहायता उस बच्चे की भरपाई कर सकती है, जिसकी हंसी हमेशा के लिए खामोश हो गई? क्या मुआवजे से उस मां-बाप का दर्द कम हो सकता है, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने बच्चे को खो दिया? सरकार को समझना होगा कि वन्यजीव हमलों में मुआवजा देना प्रशासनिक जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन नागरिकों की जान बचाना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।
राज्य सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए जिला और ब्लाक स्तर पर संवेदनशील गांवों की पहचान कर एक ठोस सुरक्षा योजना बनानी होगी। गुलदार प्रभावित क्षेत्रों में नियमित गश्त, निगरानी तंत्र, त्वरित प्रतिक्रिया दल, प्रशिक्षित वनकर्मियों की उपलब्धता और आपातकालीन सूचना व्यवस्था को मजबूत करना होगा। स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास विशेष सतर्कता बरतनी होगी। ग्रामीणों को भी वन्यजीवों की गतिविधियों और सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूक करना जरूरी है।
इसके साथ ही वन विभाग में खाली पदों, संसाधनों की कमी और क्षेत्रीय स्तर पर निगरानी की कमजोरियों की समीक्षा भी होनी चाहिए। वन्यजीव हमलों की घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण कर प्रत्येक संवेदनशील क्षेत्र के लिए अलग कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। केवल आदमखोर घोषित करने और पिंजरे लगाने तक सीमित रहने के बजाय हमलों की पुनरावृत्ति रोकने पर ध्यान देना होगा। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां पर्यटन, तीर्थाटन और विकास की बड़ी-बड़ी योजनाओं की चर्चा होती है। सरकार पहाड़ को सुरक्षित और समृद्ध बनाने के दावे करती है। लेकिन जब पहाड़ का ग्रामीण अपने बच्चे को घर के बाहर सुरक्षित नहीं रख पा रहा, तब विकास के तमाम दावे अधूरे नजर आते हैं। सड़क, बिजली, पानी और पर्यटन के साथ सुरक्षा भी विकास का अनिवार्य हिस्सा है।
यह भी विडंबना है कि पलायन रोकने की बात करने वाली सरकार के सामने पहाड़ में रहने वाले लोगों की सुरक्षा का सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है। यदि गांवों में इंसान और वन्यजीव के बीच संघर्ष इसी तरह बढ़ता रहा तो ग्रामीणों के सामने गांव छोड़ने का एक और कारण खड़ा हो जाएगा। पहाड़ के लोगों को गुलदार के साथ जीने का तरीका सिखाने से पहले सरकार को उन्हें सुरक्षित जीवन देने की जिम्मेदारी निभानी होगी। आखिर कब तक किसी मासूम की मौत के बाद ही सिस्टम की नींद टूटेगी? पहाड़ को अब आश्वासन नहीं, सुरक्षा चाहिए।

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