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भारत का बड़ा ऊर्जा प्लान

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दुनिया इस समय केवल युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों के संकट से नहीं गुजर रही, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का सवाल भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। पश्चिम एशिया में तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर अस्थिरता, तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जिस देश की ऊर्जा व्यवस्था दूसरों पर निर्भर होगी, उसकी आर्थिक मजबूती भी बाहरी परिस्थितियों की मोहताज बनी रहेगी। भारत के सामने यह चुनौती और बड़ी है, क्योंकि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ऊर्जा उपभोक्ता अर्थव्यवस्था होने के बावजूद कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करना पड़ता है। ऐसे में भारत का नया ऊर्जा रोडमैप केवल विकास की योजना नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का भी सवाल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत नवीकरणीय ऊर्जा सम्मेलन में 500 गीगावाट अतिरिक्त गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता विकसित करने और बिजली पारेषण व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में देश की प्रतिबद्धता दोहराई है। सरकार का जोर घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने, ऊर्जा भंडारण क्षमता के विस्तार, आयात के स्रोतों में विविधता लाने और सौर, पवन, जैव ईंधन तथा परमाणु ऊर्जा जैसे विकल्पों को मजबूत करने पर है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी स्पष्ट कर चुके हैं कि आने वाले समय में भारत को किसी एक ऊर्जा स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी ऊर्जा रणनीति अपनानी होगी। यह रणनीति समय की मांग है, लेकिन इसकी सफलता घोषणाओं से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से तय होगी। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में मामूली उछाल भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर डालता है। इसका सीधा प्रभाव परिवहन लागत, खाद्य वस्तुओं की कीमतों, उद्योगों के उत्पादन खर्च और महंगाई पर पड़ता है। सरकार को कई बार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए वित्तीय बोझ उठाना पड़ता है। यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला संकट अंततः भारतीय परिवारों के बजट तक पहुंच जाता है। यही वजह है कि ऊर्जा सुरक्षा को अब केवल पेट्रोलियम मंत्रालय या बिजली क्षेत्र का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। यह देश की आर्थिक स्थिरता, औद्योगिक विकास और आम आदमी की क्रय शक्ति से जुड़ा मुद्दा है। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। जून 2025 में देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंचना इस दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। सौर ऊर्जा की बढ़ती क्षमता, पवन ऊर्जा परियोजनाएं, इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार और जैव ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देना ऊर्जा के परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखते हैं। लेकिन यह भी समझना होगा कि स्थापित क्षमता और वास्तविक ऊर्जा उपलब्धता में अंतर होता है। सूरज और हवा पर निर्भर ऊर्जा उत्पादन को चौबीसों घंटे भरोसेमंद बनाने के लिए बड़े स्तर पर बैटरी भंडारण, आधुनिक बिजली ग्रिड और पारेषण नेटवर्क की जरूरत है। इन व्यवस्थाओं के बिना हरित ऊर्जा का विस्तार अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पाएगा। ऊर्जा सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष रणनीतिक भंडारण भी है। भारत के पास कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार मौजूद है, लेकिन वैश्विक मानकों के मुकाबले इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है। संकट के समय केवल दूसरे देशों से तेल खरीदने की क्षमता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि जरूरत पड़ने पर कई सप्ताह तक घरेलू मांग पूरी करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। तेल के साथ प्राकृतिक गैस और रसोई गैस के भंडारण पर भी गंभीरता से काम करना होगा। सरकार को इस दिशा में दीर्घकालिक निवेश और स्पष्ट समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए। ऊर्जा के मामले में संकट आने के बाद तैयारी करने के बजाय संकट से पहले तैयारी करना ही दूरदर्शी नीति है। हालांकि ऊर्जा आत्मनिर्भरता का अर्थ यह नहीं कि भारत रातोंरात जीवाश्म ईंधन से दूरी बना ले। देश की औद्योगिक जरूरतें, परिवहन व्यवस्था, कृषि और घरेलू ऊर्जा मांग अभी भी बड़े पैमाने पर पारंपरिक ईंधन पर निर्भर हैं। इसलिए संक्रमण की प्रक्रिया व्यावहारिक और संतुलित होनी चाहिए। कोयला, तेल और गैस की मौजूदा जरूरतों को पूरा करते हुए स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों का विस्तार करना होगा। परमाणु ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन और ऊर्जा भंडारण जैसी तकनीकों में निवेश बढ़ाना होगा। इसके साथ ही घरेलू अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और ऊर्जा उपकरणों के विनिर्माण को प्रोत्साहन देना जरूरी है, ताकि भारत केवल सौर पैनल और बैटरियां लगाने वाला देश न रहे, बल्कि इन तकनीकों के उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति का भी प्रमुख केंद्र बने। इस पूरी रणनीति में एक बड़ा सवाल आम उपभोक्ता का भी है। ऊर्जा परिवर्तन का खर्च कहीं बिजली, पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के महंगे बिलों के रूप में जनता पर न डाल दिया जाए। स्वच्छ ऊर्जा का लाभ तभी व्यापक होगा, जब उसकी पहुंच गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों तक भी सुनिश्चित हो। ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा, कृषि पंपों का सौरकरण, स्थानीय स्तर पर ऊर्जा उत्पादन और बिजली वितरण व्यवस्था में सुधार को प्राथमिकता देनी होगी। ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश का स्वागत होना चाहिए, लेकिन उसके साथ उपभोक्ता हितों और सार्वजनिक जवाबदेही की अनदेखी नहीं की जा सकती। भारत के लिए एक और चुनौती ऊर्जा कूटनीति की है। रूस, पश्चिम एशिया, अमेरिका और अन्य ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना उसकी जरूरत है। किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता संकट के समय रणनीतिक कमजोरी बन सकती है। इसलिए आयात के स्रोतों का विस्तार, समुद्री आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सहयोग को नई प्राथमिकता देनी होगी। भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में केवल खरीदार की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी बढ़ती आर्थिक ताकत के अनुरूप नीति निर्माण में भी प्रभावशाली भूमिका निभानी होगी। दरअसल, वैश्विक ऊर्जा संकट भारत के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि आयात पर अत्यधिक निर्भरता किसी भी समय आर्थिक विकास की रफ्तार को प्रभावित कर सकती है। अवसर इसलिए कि भारत अपनी ऊर्जा व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप पुनर्गठित कर सकता है। लेकिन इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, निवेश की निरंतरता, परियोजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन और नीतिगत स्थिरता जरूरी है। भारत को अब ऊर्जा सुरक्षा के मामले में प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि दूरदर्शी नीति अपनानी होगी। केवल 500 गीगावाट का लक्ष्य घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। सवाल यह है कि बिजली कितनी सस्ती होगी, कितनी निर्बाध मिलेगी, घरेलू उत्पादन कितना बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय संकट के समय देश कितने दिनों तक अपनी जरूरतें स्वयं पूरी कर सकेगा। ऊर्जा आत्मनिर्भरता का वास्तविक पैमाना यही होगा।

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