- माफी पर अड़े मंत्री ने धामी सरकार के सामने खड़ा किया सियासी संकट
- दलेर मेहंदी प्रकरण में सुबोध उनियाल का अड़ियल रुख या राजनीतिक साहस
- माफी मांगने से बेहतर इस्तीफा देने की बात,मंत्री ने गेंद सीएम के पाले में डाली
देहरादून। राजनीति में कब कौन किसके लिए मुसीबत बन जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं। उत्तराखंड की धामी सरकार में इन दिनों कुछ ऐसा ही दिलचस्प सियासी नजारा दिखाई दे रहा है। मामला मशहूर गायक दलेर मेहंदी से जुड़ा है, लेकिन सुर्खियों में हैं धामी सरकार के वरिष्ठ मंत्री सुबोध उनियाल। दलेर मेहंदी प्रकरण पर मंत्री ने जिस दोटूक अंदाज में कहा कि वह इस्तीफा देना पसंद करेंगे, लेकिन माफी नहीं मांगेंगे, उसने उत्तराखंड की राजनीति में नया बवाल खड़ा कर दिया है।
अब सवाल उठ रहा है कि असली दिलेर कौन है? नाम तो दलेर मेहंदी का है, लेकिन इस विवाद में दिलेरी दिखाने का दावा सुबोध उनियाल कर रहे हैं। फर्क इतना है कि दलेर मेहंदी का नाम संगीत की दुनिया में चर्चित है और सुबोध उनियाल का बयान सियासी गलियारों में गूंज रहा है। मंत्री की यह बेबाकी है, राजनीतिक जिद है या फिर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कवायद? फिलहाल इतना तय है कि उन्होंने ऐसा दांव खेला है, जिससे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने असहज स्थिति पैदा हो गई है।
सुबोध उनियाल का बयान सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है। एक वरिष्ठ मंत्री का सार्वजनिक रूप से यह कहना कि वह इस्तीफा दे देंगे, लेकिन माफी नहीं मांगेंगे, सीधे तौर पर राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल खड़ा करता है। मंत्री ने अपनी तरफ से लकीर खींच दी है। अब पीछे हटना उनके लिए राजनीतिक कमजोरी माना जा सकता है और सरकार के लिए उनके रुख की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि आखिर मंत्री किस बात पर इतने अडिग हैं? क्या यह वास्तव में सिद्धांतों और स्वाभिमान की लड़ाई है या फिर राजनीतिक परिस्थितियों में खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश? राजनीति में बयान देना आसान है, लेकिन उस बयान की जिम्मेदारी उठाना कठिन। इस्तीफे की पेशकश करना और वास्तव में कुर्सी छोड़ देना, दोनों में बड़ा अंतर है।
इस प्रकरण ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने भी राजनीतिक परीक्षा खड़ी कर दी है। सुबोध उनियाल सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों में हैं। उनका सार्वजनिक रुख सरकार की सामूहिक छवि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री मंत्री के साथ खड़े होते हैं तो विपक्ष सरकार को घेरने का मौका तलाशेगा। यदि मंत्री के खिलाफ कोई कदम उठाया जाता है तो सरकार के भीतर राजनीतिक संदेश जाएगा कि सार्वजनिक रूप से अपनी बात पर अड़ना भारी पड़ सकता है। यानी मामला अब केवल दलेर मेहंदी और सुबोध उनियाल के बीच नहीं रह गया है। यह मुख्यमंत्री के राजनीतिक प्रबंधन और मंत्रिमंडल के भीतर सामंजस्य की भी परीक्षा बन गया है। धामी के सामने सवाल है कि वह मंत्री की दिलेरी को सम्मान देते हैं या सरकार की साख को प्राथमिकता देते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू पंजाब और उत्तराखंड का चुनावी संयोग है। दोनों राज्यों में आने वाले समय में चुनावी गतिविधियां तेज होने वाली हैं। ऐसे में एक राज्य का विवाद दूसरे राज्य की राजनीति में भी मुद्दा बन सकता है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है, जबकि उत्तराखंड में भाजपा सत्ता में है। दोनों राज्यों में राजनीतिक दल एक-दूसरे के घटनाक्रम को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। पंजाब में भाजपा के लिए यह प्रकरण राजनीतिक सवाल खड़े करने का अवसर बन सकता है, वहीं उत्तराखंड में कांग्रेस इसे धामी सरकार की कार्यशैली से जोड़कर हमला तेज कर सकती है। कांग्रेस पहले ही ‘भूमि बचाओ-धामी हटाओ’ अभियान के जरिए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने जा रही है। अब उसे सरकार को घेरने के लिए एक और राजनीतिक मुद्दा मिल गया है।
विपक्ष के लिए किसी सरकार का आंतरिक विवाद हमेशा राजनीतिक अवसर लेकर आता है। कांग्रेस पूछ सकती है कि आखिर ऐसा कौन सा मामला है, जिसमें मंत्री माफी मांगने के बजाय इस्तीफे की बात कर रहे हैं? क्या सरकार में जवाबदेही का कोई अर्थ बचा है? क्या मंत्री का व्यक्तिगत स्वाभिमान सरकार की प्रतिष्ठा से बड़ा हो गया है? हालांकि कांग्रेस के लिए भी यह परीक्षा होगी कि वह इस प्रकरण को केवल बयानबाजी तक सीमित रखती है या इसे जवाबदेही और शासन व्यवस्था के बड़े सवाल से जोड़ पाती है। चुनावी राजनीति में मुद्दे बहुत होते हैं, लेकिन जनता के बीच वही मुद्दा असर करता है, जिसे विपक्ष तथ्यों के साथ उठाता है।
फिलहाल इस सियासी मुकाबले में हर कोई दूसरे की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा है। सुबोध उनियाल ने माफी से इनकार कर दिया है, अब निगाहें मुख्यमंत्री धामी पर हैं। विपक्ष मौके की तलाश में है और भाजपा संगठन अपने राजनीतिक नुकसान-फायदे का आकलन कर रहा है। नाम दलेर मेहंदी का, दिलेरी सुबोध उनियाल की और इम्तिहान पुष्कर सिंह धामी का! सवाल यह नहीं कि कौन ज्यादा दिलेर है, सवाल यह है कि राजनीतिक स्वाभिमान की इस लड़ाई में किसकी कुर्सी सुरक्षित रहती है और किसकी सियासी जमीन खिसकती है। पंजाब में चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा, यह वहां की जनता तय करेगी, लेकिन उत्तराखंड में इस प्रकरण ने धामी सरकार के सामने एक नया सियासी सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। आखिर इस्तीफे की बात कहकर माफी से इनकार करना दिलेरी है या सत्ता के भीतर अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश? इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।





