May 2, 2026जब देश की जनता अच्छे दिन आने की उम्मीद में मोदी की सरकार लेकर आई तो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसने अपने इतने बुरे दिन लाने का इंतजाम कर लिया है जहां भूखा मरने पर मजबूर होना पड़ेगा। अगर वर्ल्ड बैंक की ताजा रिपोर्ट पर गौर करें तो आने वाले समय में 4.5 करोड़ लोग भुखमरी की लाइन में शामिल होने वाले हैं इसका भारत पर व्यापक असर इसलिए पड़ेगा क्योंकि इनमें हर छठा आदमी भारत का है। अभी खाड़ी युद्ध के बीच राहुल गांधी ने कहा था कि 29 अप्रैल को वोटिंग समाप्त होते ही तेल और गैस की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि होगी जिसे सरकार नकार रही थी और पर्याप्त उपलब्धता की बात कर रही थी लेकिन बीते कल कमर्शियल गैस सिलेंडर के दामों में 900 रूपये की वृद्धि कर दी गई जो अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि है। कमर्शियल गैस सिलेंडर पर बीते 4 महीनो में 81 फीसदी बढ़ोतरी हो चुकी है इससे खाने—पीने की वस्तुओं पर चलने वाले व्यवसाय पर क्या असर पड़ेगा और जो बाजार के खाने पर निर्भर है उनकी जेब पर क्या असर पड़ेगा? इसे कोई समझने को तैयार नहीं है। आने वाले समय में रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में भारी वृद्धि की संभावना है तथा पेट्रोल—डीजल 25 से 30 रुपए अधिक महंगा हो सकता है। भारत अपनी जरूरत का 50 फीसदी एलपीजी आयात करता है अगर र्हाेंमुज का दरवाजा बंद रहता है तो आने वाला समय किस हद तक संकट को लेकर आएगा? इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। भले ही सरकार के द्वारा पेश किए जाने वाले दावों में देश की विकास दर सरपट दौड़ रही हो लेकिन इसकी जो हकीकत है उसको सिर्फ वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ही नहीं बता रही है डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत जो 95 तक पहुंच रही है तथा देश का शेयर बाजार जिसमें घरेलू निवेश का लाखों करोड़ हर सप्ताह डूब रहा है और रिकॉर्ड विदेशी निवेश अपना पैसा निकाल कर हर रोज भाग रहे हैं। देश की पांच ट्रिलियन वाली अर्थव्यवस्था की सच्चाई बताने के लिए काफी है। बीते साल विदेशी निवेशको 1.66 करोड़ की निकासी की थी लेकिन इस साल के बीते 4 माह में 1.19 की निकासी की जा चुकी है। भारत की विकास दर का आंकड़ा अभी भी 4 से 5 फीसदी पर अटका हुआ है। सरकार भले ही अपने आंकड़ों में इस विकास दर को कुछ भी बताएं और देश के लोगों को विकसित भारत का सपना दिखाएं, बीते 11 सालों से देश में यही सब हो रहा है लेकिन देश का गोदी मीडिया आज तक भी मोदी नोटिस कांड का बाजा बजा रहा है। मोदी कांग्रेस के समय में रुपए की कीमत 56 रूपये आने पर अपनी छाती पीटा करते थे वह अब डॉलर के मुकाबले 95 रुपए पर पहुंचने पर अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था का ढंोल पीट रहे हैं। न तो विदेशी निवेश आगे बढ़ता दिख रहा है और न निर्यात का आंकड़ा मगर विकास दर छलांगे मार रही है। सत्ता में बैठे लोग न तो सच को सुनना चाहते हैं न समझना और देखना उनका एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ चुनावी जीत तक ही सीमित भर रह गया है। इन दिनों सरकार और पूरी सरकार सिर्फ पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतने में जुटी हुई है अगर देश के 80 90 लाख लोग भुखमरी वाली स्थिति पर पहुंच भी जाते हैं तो इससे उन्हें क्या फर्क पढ़ना है। सरकार चुनाव में मस्त है तथा देश की जनता महंगाई से त्रस्त है। लोगों की जमा पूंजी ठिकाने लग रही है बैंकों के बचत खातों में पैसा आ नहीं रहा है। लोग और अधिक गरीब होते जा रहे हैं उनकी समझ नहीं आ रहा है कि यह कैसा विकास है।
May 2, 2026देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में माना जाता है देवताओं का वासयहाँ की सबसे अनूठी परंपरा है क्षेत्रपाल या भूमिपाल की अवधारणा पहाड़ के हर गांव में क्षेत्र रक्षक के रूप में करते हैं क्षेत्रपाल देवता वास देहरादून। गांव में स्थित किसी पुराने पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक छोटा सा मंदिर, जहां लोहे के त्रिशूल, घंटियां और पत्थर की मूर्तियां क्षेत्रपाल देवता के मंदिर में होती हैं। पहाड़ के हर गांव की सरहद पर एक ऐसा रक्षक देवता विराजमान होता है। यह देवता सिर्फ पूजा के प्रतीक नहीं, बल्कि क्षेत्र के रक्षक, मार्गदर्शक और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं।पहाड़ की परंपरा के अनुसार हर गांव की अपनी एक निश्चित सीमा होती है। इस सीमा की रक्षा का उत्तरदायित्व क्षेत्र रक्षक देवता का होता है। मान्यता है कि जब गांव के लोग सो जाते हैं, तब देवता अपने दिव्य घोड़े पर सवार होकर हाथ में मशाल लेकर गांव की सरहदों का चक्कर लगाते हैं और हिंसक पशुओं व बुरी आत्माओं से गांव की रक्षा करते हैं। गांव में कोई भी शुभ कार्य होकृचाहे शादी-ब्याह हो, जनेऊ संस्कार हो या नई फसल की कटाईकृसबसे पहले क्षेत्रपाल को याद किया जाता है।क्षेत्रपाल देवताओं के मंदिर आलीशान नहीं होते। अक्सर किसी विशाल पीपल या बांज के पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक छोटा सा थान होता है। वहां लोहे के त्रिशूल, घंटियां और पत्थर की मूर्तियां स्थापित होती हैं। यह सादगी इस बात का प्रतीक है कि देवता प्रकृति के कितने करीब हैं और हर ग्रामीण के लिए सुलभ हैं। पहाड़ के लोग कानून से ज्यादा अपने ग्राम देवता और क्षेत्रपाल से डरते हैं। यह विश्वास गांव में अनुशासन और नैतिकता बनाए रखने का काम करता है। ऐसी मान्यता है कि यदि गांव में कोई चोरी होती है या आपसी विवाद सुलझ नहीं पाता, तो क्षेत्रपाल के थान पर न्याय की गुहार लगाई जाती है।आधुनिक युग में भी पहाड़ की यह परंपरा अटूट है। यह विज्ञान के लिए कौतूहल हो सकता है, लेकिन एक पहाड़ी के लिए यह उसकी आस्था और पहचान है। यह क्षेत्र रक्षक देवता केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं, बल्कि हिमालयी संस्कृति के वह प्रहरी हैं, जिन्होंने सदियों से इन दुर्गम गांवों को जीवंत बनाए रखा है। आज भले ही युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हों, लेकिन अपने गांव और क्षेत्र देवता के प्रति उनकी आस्था आज भी कायम है।
May 1, 20261100 कन्याओं का पूजन व माँ राजेश्वरी का अभिषेक अल्मोड़ा। अल्मोड़ा जनपद के डोल स्थित आश्रम में आयोजित श्री कल्याणिका हिमालय देवस्थानम न्यास के श्री पीठम स्थापना महोत्सव कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रतिभाग किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने 1100 कन्याओं का पूजन कर माँ राजेश्वरी का अभिषेक एवं पूजा—अर्चना की तथा प्रदेश एवं देश की सुख—समृद्धि की कामना की।डोल आश्रम में आगमन पर मुख्यमंत्री द्वारा आश्रम परिसर में स्थापित श्रीयंत्र एवं यहां संचालित आध्यात्मिक गतिविधियों का अवलोकन किया गया। उन्होंने कहा कि यहाँ स्थापित दुनिया के सबसे बड़े श्रीयंत्र को देखकर एक विशेष आध्यात्मिक अनुभूति होती है। उन्होंने कहा कि बाबा कल्याणदास की साधना एवं तपस्या के कारण यह स्थान आज पूरे विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार का एक प्रमुख केंद्र बन गया है। साथ ही उन्होंने बाबा कल्याणदास द्वारा वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक चेतना के प्रसार हेतु किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।मुख्यमंत्री ने कहा कि यह आश्रम धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक साधना एवं सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केंद्र बन चुका है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत है और चारधाम यात्रा में प्रतिवर्ष बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या प्रदेश में विकसित हो रही बेहतर व्यवस्थाओं एवं सुविधाओं का परिणाम है।कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा, विधायक मोहन सिंह मेहरा, विधायक मनोज तिवारी, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल, भाजपा जिलाध्यक्ष महेश नयाल, जिलाधिकारी अंशुल सिंह, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक चंद्रशेखर आर घोड़के, मुख्य विकास अधिकारी रामजीशरण शर्मा सहित अन्य अधिकारी, जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
May 1, 2026श्रद्धालुओं ने लगाई हर हर गंगे के जयघोष के साथ डुबकी हरिद्वार। बुद्ध पूर्णिमा के पर्व पर हरिद्वार में हरकी पैड़ी, मालवीय द्वीप, सुभाष घाट, गौ घाट, रोडीबेलवाला घाट सहित, विभिन्न घाटों पर स्नान के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़ें। सुबह पौ फटने से ही स्नान और पूजन का क्रम चल रहा है। हर—हर गंगे और मां गंगा के जयकारों के साथ श्रद्धालु गंगा की पवन सलिला में पुण्य की डुबकी लगा रहे हैं।बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर धर्मनगरी हरिद्वार में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। हर की पौड़ी सहित गंगा घाटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। देश—विदेश से आए श्रद्धालुओं ने गंगा में आस्था की डुबकी लगाकर सुख—समृद्धि और शांति की कामना की। हर हर गंगे के जयघोष से पूरा गंगा घाट क्षेत्र गूंज उठा, जिससे माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया।एसएसपी हरिद्वार नवनीत भुल्लर का कहना है कि श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। घाटों पर अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है। वहीं ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी के जरिए लगातार निगरानी रखी जा रही है। इसके साथ ही भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग और ट्रैफिक डायवर्जन की भी विशेष व्यवस्था लागू की गई है, ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था ना हो। वहीं हरिद्वार स्थित नारायणी शिला के मुख्य सेवक प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज त्रिपाठी के अनुसार हिंदू पंचांग के वैशाख मास की पूर्णिमा का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। इसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसी पावन तिथि पर भगवान गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। यह तिथि हिंदू धर्म के साथ—साथ बौद्ध धर्म में भी अत्यंत पवित्र मानी गई है।
May 1, 2026उद्योगपति गौतम अडानी पहुंचे केदारधाम रूद्रप्रयाग। केदारनाथ धाम में अव्यवस्थाओं और वीआईपी दर्शन को लेकर तीर्थ पुरोहितों का पारा चढ़ गया। उन्होंने बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। साथ ही वीआईपी गेट बंद करने की मांग उठाई। जिसका वीडियों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।केदारनाथ मंदिर परिसर में तीर्थपुरोहितों ने कहा कि वीआईपी कल्चर को तुरंत समाप्त किया जाए। उनका कहना है कि विशेष लोगों को दी जा रही प्राथमिकता से आम श्रद्धालुओं को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। तीर्थपिरोहितों ने बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और मुर्दाबाद के नारे भी लगाए।बता दें कि बीकेटीसी और जिला प्रशासन का यह दावा है कि इस बार यात्रा में वीईआईपी कल्चर खत्म किया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी यह कहते है कि सभी श्रद्धालु एक समान हैं, किसी को वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं दिया जाएगा। बावजूद इसके केदारनाथ धाम में प्रदर्शन की तस्वीरें यह बताने के लिए काफी है कि इन आदेशों का कितना पालन हो रहा है।देश के प्रमुख उघोगपति गौतम अडानी ने आज सुबह केदारनाथ धाम में दर्शन किए। इस अवसर पर उनके साथ उनकी पत्नी भी मौजूद रहीं। अपनी शादी की 40वीं वर्षगांठ के मौके पर दोनों ने भगवान शिव का जलाभिषेक कर आशीर्वाद लिया। अडाणी सुबह दिल्ली से देहरादून पहुंचे और वहां से निजी हेलिकॉप्टर के जरिए केदारनाथ धाम पहुंचे। वीआईपी आगमन को देखते हुए केदारनाथ धाम क्षेत्र में सुरक्षा और व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासन अलर्ट रहा। माना जा रहा है कि अडानी को दर्शन के लिए वीआईपी सुविधा प्रदान की गई, जिससे तीर्थपुरोहितों में नाराजगी व्याप्त है। केदारनाथ दर्शन के बाद अडानी ने प्रस्तावित सोनप्रयाग—केदारनाथ रोपवे परियोजना का हवाई सर्वे भी किया।
May 1, 2026खेत की मेड़ पर ‘डाइनिंग टेबल’ आपसी मेलजोल और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है ‘पंगत’ पहाड़ की परंपराकृमें एक साथ बैठकर भोजन करने की प्रथा रिश्तों, श्रम और सादगी का यह उत्सव आज भी है जीवित पहली ग्रास अक्सर जमीन पर देवता या प्रकृति को देते हैं देहरादून। उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों पर जब धूप की पहली किरणें सीढ़ीदार खेतों को छूती हैं, तो केवल खेती का काम शुरू नहीं होता, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव की शुरुआत होती है। पहाड़ में खेती केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि आपसी मेलजोल और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है। यहाँ की एक सुंदर परंपरा हैकृपंगत में बैठकर खेत में ही भोजन करना।खेतों में एक साथ बैठकर खाना खाने की यह परंपरा उत्तराखंड के पहाड़ों की आत्मा है। यह हमें सिखाती है कि सादगी में भी खुशी होती है और मिल-बांटकर जीने में ही असली समृ(ि छिपी है। पहाड़ की यह परंपरा आज भी रिश्तों को मजबूत करने और जीवन को सहज बनाने का संदेश देती है। आज पलायन के कारण पहाड़ के कई खेत बंजर हो और मकान बीरान हो गए हैं, लेकिन जो लोग आज भी वहाँ टिके हैं, उन्होंने इस परंपरा को जीवित रखा है। खेत में बैठकर एक साथ भोजन करना हमें सिखाता है कि खुशी अकेले नहीं, बल्कि मिल-बाँटकर जीने में है। मिट्टी की वह सोंधी खुशबू और अपनों के साथ साझा किया गया वह पिसा हुआ नमक आज भी हर उस पहाड़ी की यादों में बसा है जो अपने गांव से दूर शहर में बैठा है।उत्तराखंड के पहाड़ों में जीवन सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि सामूहिकता और अपनत्व की जीवंत परंपराओं का भी प्रतीक है। इन्हीं परंपराओं में एक खूबसूरत परंपरा हैकृखेतों में काम के बीच एक साथ बैठकर खाना खाना। यह सिर्फ भूख मिटाने का समय नहीं, बल्कि रिश्तों को सींचने, थकान मिटाने और जीवन को साझा करने का अवसर होता है। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थिति में अकेले खेती करना लगभग असंभव है। इसलिए यहाँ सामूहिक मदद की परंपरा है। जब गाँव में किसी एक के खेत की रोपाई या कटाई होती है, तो पूरा गाँव अपनी कुदाल और दरांती लेकर पहुँच जाता है।अकेले कुमाऊं के कुछ हिस्सों में खेतों में काम के दौरान हुड़का बजाकर लोकगीत गाए जाते हैं। धुनों की ताल पर हाथ चलते हैं और थकान का नामोनिशान नहीं होता। दोपहर होते-होते जब सूरज सिर पर आ जाता है, तो काम रोक दिया जाता है। किसी बड़े बांज या बुरांश के पेड़ की छाँव में, या सीधे खेत की मेड़ पर ही बैठने का इंतजाम होता है। खेत में बैठकर खाने का स्वाद किसी फाइव-स्टार होटल के खाने से कहीं ऊपर होता है। यह भोजन केवल भूख मिटाने के लिए नहीं होता, बल्कि यह गाँव की सोशल नेटवर्किंग का समय होता है। बुजुर्ग यहाँ बैठकर पुरानी कहानियाँ सुनाते हैं। युवा अपनी भविष्य की योजनाओं और शहर की बातों पर चर्चा करते हैं। महिलाएं अपने लोकगीतों जैसे झुमैलो या चांचरी के जरिए सुख-दुख साझा करती हैं। भोजन शुरू करने से पहले, पहली ग्रास कौर अक्सर जमीन पर देवता या प्रकृति के नाम से रखी जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि हम जो खा रहे हैं, वह उस मिट्टी की ही देन है।हालांकि, बदलते समय और पलायन के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। गांवों में लोगों की संख्या घट रही है और खेती का दायरा भी सिमट रहा है। इसके बावजूद जहां भी यह परंपरा जीवित है, वहां यह आज भी उतनी ही गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ निभाई जाती है। प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में जून से लेकर अगस्त तक धान की रौपाई के समय यह परंपरा हर जगह दिख जाती है। इसके साथ ही आज के दौर में जहां शादी व अन्य समारोहों में टेंट का प्रचलन बढ़ गया है। इसके बाद भी पहाड़ के गांवों में आज भी कई स्थानों पर इस परंपरा को निभाया जाता है। बदलते दौर में पहाड़ को अगर आपने करीब से देखना है तो आ जाइए मेने पहाड़।