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पत्रकारिता का अघोषित आपातकाल

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उत्तराखंड के आईजी (एसटीएफ) नीलेश आनंद भरणे द्वारा सूबे के 35 एक्स हैंडल को नोटिस जारी कर उन पर संवैधानिक व्यवस्थाओं के खिलाफ काम करने का जो आरोप लगाते हुए उन्हें ब्लॉक करने की कार्रवाई की जो चेतावनी दी गई है वह चेतावनी नहीं सही मायने में धमकी है। यह कार्यवाही इसलिए भी हैरान करने वाली नहीं है क्योंकि बीते कई सालों से सोशल मीडिया की तमाम साइट्स पर इस तरह की कार्यवाही की जाती रही हैं। इसका कारण भी किसी से छुपा नहीं है सत्ता में बैठे लोगों को न तो मीडिया द्वारा किए जाने वाले सवाल पसंद है और न वह सरकार की आलोचना बर्दाश्त करते है भले ही वह कितनी भी बड़ी सच्चाई क्यों न हो। सरकार में बैठे लोग सिर्फ अपनी तारीफ में लिखे जाने वाली खबरों और टीवी में दिखाई जाने वाली खबरों को ही देखने और सुनने के आदी हो चुके हैं। देश का मुख्य मीडिया जब सरकारों की शान में कसीदे पढ़ने को ही पत्रकारिता स्वीकार कर चुका है तो ऐसे समय में सोशल मीडिया ने जब सही और सच्ची खबरों को जनता तक पहुंचाना शुरू कर दिया तब इससे सरकार में बैठे लोगों का असहज होना स्वाभाविक ही है जहां तक बात अधिकारियों की है तो उन्होंने भी सरकार की नौकरी ही करनी है और वह कर भी रहे हैं इन असाधारण स्थितियों में पत्रकारिता करना एक गंभीर चुनौती हो चुका है। सोशल मीडिया में क्या चल रहा है इस पर गहरी नजर रखी जा रही है और उन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तथा पत्रकारों के खिलाफ कार्यवाही लगातार जारी है इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के खिलाफ 2023 में 6000 सोशल हैंडल्स के खिलाफ ऐसी कार्यवाही हुई जिसकी संख्या 2024 में बढ़कर 12600 तथा दिसंबर 2025 तक इनकी संख्या 24300 हो चुकी थी। दरअसल देश में े पत्रकारिता का अघोषित आपातकाल ही नहीं है उससे भी ज्यादा खतरनाक स्थित है। 70 के दशक में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने देश में आपातकाल लगाया उस समय तमाम अखबारों के साथ ऐसा हुआ था लेकिन वह बहुत थोड़े समय ही रहा और न उस समय देश में सोशल मीडिया और निजी टीवी चैनलों का कोई दौर था। वर्तमान समय में गुजरते वक्त के साथ जब सब कुछ बदल चुका है। देश और दुनिया में घटित होने वाली कोई घटना कुछ मिनट में 80 फीसदी आबादी तक पहुंच रही है तो उसका प्रभाव भी उतना ही अधिक होना स्वाभाविक है। चाहे वह प्रधानमंत्री से पूछे जाने वाले वह सवाल हो कि आप आम कैसे खाते हैं काटकर या चूस कर, मणिपुर में महिलाओं को निर्वस्त्र कर घूमाने की घटना हो हर खबर से आम आदमी वाकिफ ही नहीं हो पा रहा है उसकी लाइव तस्वीर भी उस तक पहुंच रही हैं। सरकार की छवि को धूमिल करने वाली ऐसी खबरें क्योंकि सच का आइना दिखाती हैं उन्हें जिम्मेवार लोग भला कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं यही कारण है कि अब सत्ता के निशाने पर सोशल मीडिया है। उत्तराखंड के जिन 35 पत्रकारों या सोशल साइट्स को यह नोटिस जारी किए गए हैं उनमें से एक अजीत राठी ने अपने एक्स हैंडल पर इस नोटिस के बारे में कई सवाल आईजी एसटीएफ से भी पूछे गए हैं वही यह स्पष्ट किया गया है अपनी उस पोस्ट को डिलीट नहीं करेंगे जिसे आधार बनाकर उन पर कार्रवाई की बात कही गई है वह जांच में सहयोग और इस खबर की सत्यता की पुष्टि करने वाले सबूतों के साथ किसी के भी सामने उपस्थित होने को तैयार हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना पत्रकारिता संभव नहीं है। निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता को बचाने रखने के लिए अगर थोड़ी कुर्बानियां भी करनी पड़ती हैं तो उसके लिए पत्रकारों को वर्तमान दौर में तैयार रहना ही होगा।

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