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खेतों में एक साथ बैठकर खाना खाने की परंपरा उत्तराखंड के पहाड़ों की आत्मा

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  • खेत की मेड़ पर ‘डाइनिंग टेबल’
  • आपसी मेलजोल और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है ‘पंगत’
  • पहाड़ की परंपराकृमें एक साथ बैठकर भोजन करने की प्रथा
  • रिश्तों, श्रम और सादगी का यह उत्सव आज भी है जीवित
  • पहली ग्रास अक्सर जमीन पर देवता या प्रकृति को देते हैं

देहरादून। उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों पर जब धूप की पहली किरणें सीढ़ीदार खेतों को छूती हैं, तो केवल खेती का काम शुरू नहीं होता, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव की शुरुआत होती है। पहाड़ में खेती केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि आपसी मेलजोल और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है। यहाँ की एक सुंदर परंपरा हैकृपंगत में बैठकर खेत में ही भोजन करना।
खेतों में एक साथ बैठकर खाना खाने की यह परंपरा उत्तराखंड के पहाड़ों की आत्मा है। यह हमें सिखाती है कि सादगी में भी खुशी होती है और मिल-बांटकर जीने में ही असली समृ(ि छिपी है। पहाड़ की यह परंपरा आज भी रिश्तों को मजबूत करने और जीवन को सहज बनाने का संदेश देती है। आज पलायन के कारण पहाड़ के कई खेत बंजर हो और मकान बीरान हो गए हैं, लेकिन जो लोग आज भी वहाँ टिके हैं, उन्होंने इस परंपरा को जीवित रखा है। खेत में बैठकर एक साथ भोजन करना हमें सिखाता है कि खुशी अकेले नहीं, बल्कि मिल-बाँटकर जीने में है। मिट्टी की वह सोंधी खुशबू और अपनों के साथ साझा किया गया वह पिसा हुआ नमक आज भी हर उस पहाड़ी की यादों में बसा है जो अपने गांव से दूर शहर में बैठा है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में जीवन सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि सामूहिकता और अपनत्व की जीवंत परंपराओं का भी प्रतीक है। इन्हीं परंपराओं में एक खूबसूरत परंपरा हैकृखेतों में काम के बीच एक साथ बैठकर खाना खाना। यह सिर्फ भूख मिटाने का समय नहीं, बल्कि रिश्तों को सींचने, थकान मिटाने और जीवन को साझा करने का अवसर होता है। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थिति में अकेले खेती करना लगभग असंभव है। इसलिए यहाँ सामूहिक मदद की परंपरा है। जब गाँव में किसी एक के खेत की रोपाई या कटाई होती है, तो पूरा गाँव अपनी कुदाल और दरांती लेकर पहुँच जाता है।
अकेले कुमाऊं के कुछ हिस्सों में खेतों में काम के दौरान हुड़का बजाकर लोकगीत गाए जाते हैं। धुनों की ताल पर हाथ चलते हैं और थकान का नामोनिशान नहीं होता। दोपहर होते-होते जब सूरज सिर पर आ जाता है, तो काम रोक दिया जाता है। किसी बड़े बांज या बुरांश के पेड़ की छाँव में, या सीधे खेत की मेड़ पर ही बैठने का इंतजाम होता है। खेत में बैठकर खाने का स्वाद किसी फाइव-स्टार होटल के खाने से कहीं ऊपर होता है। यह भोजन केवल भूख मिटाने के लिए नहीं होता, बल्कि यह गाँव की सोशल नेटवर्किंग का समय होता है। बुजुर्ग यहाँ बैठकर पुरानी कहानियाँ सुनाते हैं। युवा अपनी भविष्य की योजनाओं और शहर की बातों पर चर्चा करते हैं। महिलाएं अपने लोकगीतों जैसे झुमैलो या चांचरी के जरिए सुख-दुख साझा करती हैं। भोजन शुरू करने से पहले, पहली ग्रास कौर अक्सर जमीन पर देवता या प्रकृति के नाम से रखी जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि हम जो खा रहे हैं, वह उस मिट्टी की ही देन है।
हालांकि, बदलते समय और पलायन के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। गांवों में लोगों की संख्या घट रही है और खेती का दायरा भी सिमट रहा है। इसके बावजूद जहां भी यह परंपरा जीवित है, वहां यह आज भी उतनी ही गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ निभाई जाती है। प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में जून से लेकर अगस्त तक धान की रौपाई के समय यह परंपरा हर जगह दिख जाती है। इसके साथ ही आज के दौर में जहां शादी व अन्य समारोहों में टेंट का प्रचलन बढ़ गया है। इसके बाद भी पहाड़ के गांवों में आज भी कई स्थानों पर इस परंपरा को निभाया जाता है। बदलते दौर में पहाड़ को अगर आपने करीब से देखना है तो आ जाइए मेने पहाड़।

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