Home News Posts उत्तराखंड ‘धधक’ रहे जंगल, घुट रही हैं ‘सांसें’

‘धधक’ रहे जंगल, घुट रही हैं ‘सांसें’

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  • गढ़वाल और कुमाऊं के कई क्षेत्रों के जंगलों में लगी भीषण आग
  • पहाड़ की जलधाराओं,वन्यजीवों और पर्यावरण पर मंडराया संकट
  • जंगलों में आग से मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा और बढ़ने की संभावना

देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ इन दिनों एक भयानक त्रासदी से गुजर रहे हैं। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक पहाड़ियों की ढलानें हरी-भरी वनस्पतियों के बजाय दावानल की नारंगी लपटों से धधक रही हैं। रात के अंधेरे में दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो पूरे पहाड़ ने आग की चादर ओढ़ ली हो। दिन के समय आसमान में सूरज की रोशनी धुंध और काले धुएं के पीछे छिप गई है। यह आग सिर्फ पेड़ों को राख नहीं कर रही, बल्कि उत्तराखंड की पारिस्थितिकी, वन्यजीवों और इंसानी जिंदगियों को भी अपनी चपेट में ले रही है।
यह मौसम पहाड़ में कई दुर्लभ पक्षियों और वन्यजीवों के प्रजनन का होता है। काफल, बुरांश और बांज के जंगलों में लगी इस आग ने काफल-पाको जैसे अनगिनत पक्षियों के घोंसले और उनके अंडों को जलाकर खाक कर दिया है। आग से बचने के लिए काकड़, गुलदार और जंगली सूअर आबादी वाले क्षेत्रों की तरफ भाग रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा और बढ़ गया है।
उत्तराखंड के जंगलों में गर्मियां आते ही आग जैसे नियति बन गई है। सूखी चीड़ की पत्तियां छोटी सी चिंगारी को भी भयावह आग में बदल देती हैं। कई बार यह आग गांवों तक पहुंच जाती है। लोगों के पशुओं के लिए चारा, जंगलों की जड़ी-बूटियां और पेयजल स्रोत तक इसकी चपेट में आ जाते हैं। पहाड़ के लोग कहते हैं कि जंगल जलते हैं तो केवल पेड़ नहीं मरते, गांव की जिंदगी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जंगलों की आग अब मौसम और पर्यावरण को भी बदल रही है, जिन पहाड़ियों पर कभी ठंडी हवाएं बहती थीं, वहां अब धुएं की गंध महसूस होती है। गाड़-गदेरे और प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगे हैं।

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