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माक ड्रिल की तैयारी और हकीकत

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उत्तराखंड आपदाओं का प्रदेश है। यहां भूकंप, भूस्खलन, बादल फटना, अतिवृष्टि और जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाएं हर वर्ष किसी न किसी रूप में दस्तक देती हैं। ऐसे में आपदा प्रबंधन की तैयारियों को परखने के लिए समय-समय पर माक ड्रिल आयोजित की जाती हैं। सरकारी दावों के अनुसार इन अभ्यासों का उद्देश्य आपात स्थिति में प्रशासन, बचाव एजेंसियों और आम जनता की तैयारियों का परीक्षण करना होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या माक ड्रिल वास्तव में आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूत कर रही हैं या फिर यह केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं? बीते वर्षों में उत्तराखंड ने कई बड़ी त्रासदियां देखी हैं। 2013 की केदारनाथ आपदा हो या फिर चमोली का )षिगंगा हादसा, इन घटनाओं ने यह साबित किया कि पहाड़ में आपदा कभी भी और किसी भी रूप में आ सकती है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर तैयारियों की स्थिति आज भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। प्रदेश में आयोजित होने वाली अधिकांश माक ड्रिलें जिला मुख्यालयों या चुनिंदा संस्थानों तक सीमित रह जाती हैं, जिन दूरस्थ गांवों में आपदा का खतरा सबसे अधिक है, वहां न तो लोगों को पर्याप्त प्रशिक्षण मिलता है और न ही आपातकालीन बचाव की जानकारी। कई स्थानों पर माक ड्रिल केवल अधिकारियों की मौजूदगी, तस्वीरों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित दिखाई देती हैं। सबसे बड़ा सवाल संसाधनों का है। यदि वास्तविक आपदा आ जाए तो क्या सभी जिलों के पास पर्याप्त बचाव उपकरण, प्रशिक्षित मानव संसाधन और त्वरित राहत व्यवस्था उपलब्ध है? क्या पहाड़ी क्षेत्रों में संचार व्यवस्था इतनी मजबूत है कि संकट की घड़ी में सूचना तुरंत पहुंच सके? क्या गांवों में लोगों को यह पता है कि भूकंप या भूस्खलन के दौरान क्या करना चाहिए? इन सवालों के जवाब अक्सर निराश करने वाले मिलते हैं। माक ड्रिल का उद्देश्य केवल अभ्यास करना नहीं, बल्कि कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करना होना चाहिए। यदि किसी अभ्यास में यह सामने आता है कि किसी क्षेत्र तक राहत दल पहुंचने में अत्यधिक समय लग रहा है या संचार व्यवस्था कमजोर है, तो उस कमी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता और अगले वर्ष फिर वही अभ्यास, वही दावे और वही कमियां दोहराई जाती हैं। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में आपदा प्रबंधन को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जन आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता है। स्कूलों, कालेजों, ग्राम सभाओं और स्थानीय स्वयंसेवी समूहों को आपदा प्रशिक्षण से जोड़ना होगा। प्रत्येक गांव में स्थानीय आपदा प्रतिक्रिया दल तैयार करने होंगे और लोगों को प्राथमिक उपचार तथा बचाव के बुनियादी प्रशिक्षण से लैस करना होगा। यह भी समझना होगा कि माक ड्रिल की सफलता उसकी तस्वीरों या आंकड़ों से नहीं, बल्कि वास्तविक आपदा के समय उसकी उपयोगिता से तय होती है। यदि आपदा आने पर लोग घबरा जाएं, प्रशासन समन्वय न बना पाए और राहत कार्यों में देरी हो, तो इसका अर्थ यही है कि हमारी तैयारियां अभी भी अधूरी हैं। उत्तराखंड के लिए माक ड्रिल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकती है। इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर इस अभ्यास को कागजी प्रक्रिया से निकालकर जमीनी तैयारी का प्रभावी माध्यम बनाएं। क्योंकि पहाड़ में आपदाएं पूर्व सूचना देकर नहीं आतीं, लेकिन उनसे निपटने की तैयारी पहले से की जा सकती है।

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