- भीतरघातियों को बाहर का रास्ता, गुटबाजी आई सामने
- विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने दे दिया सख्त संदेश
- कांग्रेस ने आक्रामक तेवर के बीच की अपनों पर कार्रवाई
- अनुशासन के सहारे कांग्रेस संगठन को साधने की कवायद
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही प्रदेश कांग्रेस ने अपने संगठन को लेकर सख्त रुख अपनाना शुरू कर दिया है। एक ओर पार्टी भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर उसने अपने ही कार्यकर्ताओं और नेताओं पर अनुशासन का डंडा चलाना शुरू कर दिया है। हाल के दिनों में पार्टी विरोधी गतिविधियों, सार्वजनिक बयानबाजी और संगठन के खिलाफ काम करने के आरोप में कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को बाहर का रास्ता दिखाया गया है। राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस की इस कार्रवाई को विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को एकजुट रखने और अनुशासन स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, यह कदम पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और गुटबाजी को भी उजागर कर रहा है।
प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व इस बार किसी भी कीमत पर अनुशासनहीनता को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिख रहा है। पार्टी नेताओं का मानना है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण से लेकर स्थानीय स्तर की गुटबाजी ने कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया था। कई सीटों पर पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ बगावत और अंदरूनी विरोध ने चुनावी गणित बिगाड़ दिया था। इसी अनुभव को देखते हुए प्रदेश नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया है कि चुनाव से पहले संगठन विरोधी गतिविधियों में शामिल किसी भी नेता या कार्यकर्ता पर कार्रवाई की जा सकती है।
कांग्रेस इन दिनों महंगाई, बेरोजगारी, भू-कानून, पलायन, चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। लेकिन पार्टी नेतृत्व यह भी समझ रहा है कि यदि अंदरूनी कलह पर नियंत्रण नहीं हुआ तो भाजपा के खिलाफ आक्रामकता का राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाएगा। यही कारण है कि कांग्रेस ने एक साथ दो मोर्चों पर लड़ाई शुरू की हैकृबाहर भाजपा के खिलाफ और भीतर असंतुष्ट एवं अनुशासनहीन नेताओं के खिलाफ। उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी की समस्या से जूझती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री, वरिष्ठ नेताओं और क्षेत्रीय क्षत्रपों के अलग-अलग शक्ति केंद्रों ने कई बार संगठनात्मक फैसलों को प्रभावित किया है। ऐसे में पार्टी से कुछ कार्यकर्ताओं को बाहर करने भर से क्या गुटबाजी खत्म हो जाएगी, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय बंटी हुई है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई का संदेश तो जाएगा, लेकिन यदि असंतोष के कारणों का समाधान नहीं हुआ तो चुनाव नजदीक आते-आते बगावत के नए स्वर भी सामने आ सकते हैं। कांग्रेस की हालिया सक्रियता को टिकट की संभावित लड़ाई से भी जोड़कर देखा जा रहा है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन कई विधानसभा क्षेत्रों में दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। ऐसे में संगठन विरोधी गतिविधियों पर सख्ती को आगामी टिकट वितरण की तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि 2027 से पहले किसी भी स्तर पर ऐसा माहौल बने, जिससे यह संदेश जाए कि कांग्रेस अभी भी अपने अंदरूनी संघर्षों से बाहर नहीं निकल पाई है।
कांग्रेस की ताजा कार्रवाई का राजनीतिक संदेश स्पष्ट हैकृजो पार्टी लाइन से हटेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। लेकिन इसके साथ ही पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि अनुशासन और असंतोष के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी भाजपा नहीं, बल्कि कई बार उसकी अपनी अंदरूनी खींचतान रही है। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले अपने ही कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई पार्टी को अनुशासित संगठन का चेहरा दे सकती है, लेकिन यदि यह असंतोष को और बढ़ाती है तो इसका उल्टा असर भी पड़ सकता है।
वही दूसरी ओर भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए हर मोर्चे पर संघर्ष का संदेश देना चाहती है। ऐसे में पार्टी का यह सख्त रुख आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस की यह अनुशासनात्मक मुहिम संगठन को मजबूत करती है या फिर चुनाव से पहले नए असंतोष और नए समीकरणों को जन्म देती है।




