- दून में स्कूल बने पैसा उगाही केंद्र
देहरादून। संविधान भले ही हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार देता हों और देश तथा प्रदेशों की सरकारों द्वारा स्कूलों के लिए सख्त नियमावली बनाई गई हो लेकिन शिक्षा के व्यवसाय को रोकने में शासन—प्रशासन की नाकामी के कारण आम आदमी के बच्चों को उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पहलू से वंचित होना पड़ रहा है क्योंकि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर शून्य हो चुका है तथा निजी स्कूलों की शिक्षा इतनी महंगी है कि आम तो क्या खास लोग भी इसका बोझ सहन नहीं कर पा रहे हैं ऊपर से निजी स्कूलों की मनमानी अभिभावक के लिए जी का जंजाल बनी हुई है।

उत्तराखंड की राजधानी दून जिसे शिक्षा के लिए देश—विदेश तक जाना जाता था उसका हाल तो इतना बिगड़ चुका है कि यहां एक आम आदमी अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने की बात सोच भी नहीं सकता है। शिक्षा के आधुनिकीकरण के नाम पर आए दिन स्कूल तो खोले जा रहे हैं लेकिन इन स्कूलों में शिक्षा के नाम पर जो लूट हो रही है वह आर्श्चयजनक है। इस साल राजधानी दून में छोटे बच्चों के लिए खुलने वाले दो स्कूलों जिसमें से एक का नाम है द सनराइज और दूसरे का नाम है टर्क्वोइज। छोटे बच्चों के लिए इस साल खुलने वाले इन दोनों स्कूलों द्वारा जारी किए गए प्रोस्पेक्टस पर एक नजर डाली जाए तो इन स्कूलों में आवेदन का शुल्क 5000 है, आपके बच्चे का दाखिला होगा या नहीं यह अलग बात है। रजिस्ट्रेशन शुल्क तो 5000 देना ही होगा। फ्री फाउंडेशन से लेकर कक्षा 2 से 5 तक आपके बच्चे को यह क्या शिक्षा देंगे? यह तो अलग बात है अगर बच्चे को स्कूल भेजने के लिए मां—बाप को एडमिशन फीस के नाम पर 50 और 75 हजार वसूल जरूर करेंगे मंथली फीस जो हजार से लेकर 9000 तक होगी वह तो होगी ही इसके अलावा एनुअल (वार्षिक) फीस के नाम पर भी 10—15 हजार वसूले जाएंगे। सवाल यह है कि किसी भी निजी क्षेत्र में काम करने वाला एक आदमी जो 15 से 20 हजार तक ही कमाता है। इन आधुनिक विघालयों में अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने की सोच भी नहीं सकता है। इसके ऊपर से बच्चों की ड्रेस व स्कूल भेजने का खर्चा अलग।

बीते कल की ही बात है जब प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रीतम सिंह ने डीएम दूनं सविन बंसल से मिलकर निजी स्कूलों की मनमानियों और वसूलियों को लेकर लंबी बातचीत की। दून में आए दिन इन स्कूलों के प्रबंधको और अभिभावकों के टकराव वह तकरार की खबरें तो आम हो गई हैं। सवाल यह है कि देश की शिक्षा व्यवस्था की इस दुर्दशा के लिए क्या सरकारे जिम्मेदार नहीं है? जब दुर्दशा हो ही चुकी है तो इसको ठीक कैसे किया जा सकता है? क्या भारत में भी नेपाल की तरह सभी निजी स्कूलों तथा कोचिंग सेंटरों पर बैन लगाकर स्थिति को सुधारा जा सकता है?




