देहरादून। स्पेक्स संस्था के डॉक्टर ब्रजमोहन शर्मा ने कहा कि फलों तथा सब्जियों की उत्पादकों तथा खरीदार उपभोक्ताओं में जन जागरूकता अभियान चलाकर वैकल्पिक उपाय किए जाने जरूरी हैं।
आज यहां आम नागरिकों में कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों को पैदा करने वाले कैल्शियम कार्बाइड आदि एजेंट्स को अधपके आम, केला,पपीता,को पके हुए फलों के रूप में बेचकर लोगों को मौत के मुंह में धकेलने की खतरनाक आदतों पर दून वासियों ने की रोक लगाने की मांग। संयुक्त नागरिक संगठन द्वारा आयोजित संवाद में भारतीय खाघ सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा उत्तराखंड समेत सभी राज्यों को फलों को जहरीले एजेंट और सिंथेटिक रसायन लेप(कोटिंग)की खतरनाक प्रवृति पर विशेष अभियान चलाने के निर्देशो को जागरूक दून वासियों ने सामयिक स्वागत योग्य कदम बताया। स्पेक्स संस्था के डॉक्टर ब्रजमोहन शर्मा ने उत्तराखंड में प्राधिकरण के निर्देशों के क्रियान्वयन को गंभीर चुनौती बताते हुए कहा है कि बिना स्थानीय प्रशासन, विषय विशेषज्ञ तथा आम जन के सहयोग, इस नीति की सफलता कठिन है। इनके अनुसार फलों तथा सब्जियों की उत्पादकों तथा खरीदार उपभोक्ताओं में जन जागरूकता अभियान चलाकर वैकल्पिक उपाय किए जाने जरूरी हैं। सोशल जस्टिस फाऊंडेशन की डॉक्टर आशा लाल टम्टा का कहना था कि खतरनाक रसायनों का प्रयोग भोजन की थाली में जहर बनकर हमारे शरीर में जा रहा है।इससे हमारे और बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर आघात पहुंच रहा है।हमें खाघ पदार्थों की बनावटी चमक दमक से प्रभावित न होकर प्राकृतिक रूप से पके हुए फलों सब्जियों का प्रयोग करना होगा। इसमें सभी ग्रहणियों को अपनी ओर से पहले पहल करनी होगी।अखिल भारतीय पूर्व सैनिक परिषद के मेजर एम एस रावत के अनुसार फलों को कृत्रिम ढंग से जल्द पकाने में प्रयोग किए जाने वाले रसायनों से एसिटिलीन जैसी हानिकारक गैस निकलती है जो आर्सेनिक और फास्फोरस जैसे हानिकारक तत्वों से युक्त होती है। ऐसे फलों को खाने से अल्सर उल्टी होती है जो लीवर और किडनी को नुकसान पहुंचती है।ऐसे फलों की सेल्फ लाइफ भी कम होती है।हमें प्राकृतिक रूप से पके फलों जो स्वादिष्ट और पौष्टिक होते हैं, उनका ही खाना चाहिए।शताब्दी एनक्लेव विकास समिति के अध्यक्ष प्रमेंद्र सिंह बर्थवाल का कहना था कि सभी पेड़ों पर फल एक साथ नहीं पकते हैं।पके फलों को मंडियों तक पहुंचाने फिर इनके विपणन जैसी कठिनाइयों को दूर कर किसानों की समस्याओं को हल किया जा सकता है।इससे इनका आर्थिक नुकसान भी नहीं होगा और उपभोक्ताओं को भी ये आसानी से सुलभ होंगे।उत्पादकों में जागरूकता अभियान चलाकर इनको जहरीले तत्वों के प्रयोग के प्रति शिक्षित किया जा सकता है।




