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‘कमजोर कड़ियों’ को मजबूत करने में जुटी भाजपा-कांग्रेस

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  • सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए भाजपा की पैनी नजर, तो वापसी के लिए कांग्रेस का आक्रामक रुख

देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने अभी से अपनी चुनावी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। दोनों दलों का सबसे बड़ा फोकस उन विधानसभा सीटों पर है, जहां पिछली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा जहां अपनी हारी हुई सीटों और बूथों की समीक्षा कर जीत की हैट्रिक का रास्ता तलाश रही है, वहीं कांग्रेस उन सीटों को दोबारा जीतने और भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति बना रही है। भाजपा ने विशेष रूप से हारे हुए बूथों पर फोकस करने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने का अभियान शुरू किया है।
प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कई महीने शेष हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सत्ता में बैठी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों ने अपनी पिछली हार का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया है। दोनों दलों के रणनीतिकार उन विधानसभा क्षेत्रों की फाइलें खंगाल रहे हैं, जहां पिछली बार हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी माहौल को नियंत्रित करने और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की है। पार्टी नेतृत्व मानता है कि यदि पिछली बार हारी हुई सीटों और कमजोर बूथों पर प्रदर्शन सुधारा गया तो 2027 का चुनाव अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसी कारण संगठन स्तर पर बूथों की समीक्षा, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय समीकरणों का आकलन किया जा रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस को विश्वास है कि भाजपा सरकार के खिलाफ बढ़ती जन असंतुष्टि, बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और अधूरे वादों के मुद्दे उसे राजनीतिक बढ़त दिला सकते हैं। कांग्रेस उन सीटों पर विशेष ध्यान दे रही है जहां पिछली बार जीत का अंतर कम रहा था। पार्टी स्थानीय नेताओं को सक्रिय करने और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा संगठन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि चुनावी जीत का रास्ता बूथों से होकर गुजरता है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने हारे हुए बूथों और सीटों का विस्तृत विश्लेषण शुरू किया है। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में उन कारणों की समीक्षा की जा रही है जिनकी वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। स्थानीय नाराजगी, गुटबाजी, टिकट वितरण और संगठनात्मक कमजोरियों को चिन्हित किया जा रहा है।
संगठन पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को गांव-गांव जाकर फीडबैक लेने की जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा की कोशिश है कि चुनाव से पहले किसी भी प्रकार की नाराजगी को दूर कर एकजुटता का संदेश दिया जाए। कांग्रेस भी इस बार कोई मौका गंवाना नहीं चाहती। पार्टी ने उन सीटों की सूची तैयार की है जहां जीत का अंतर बेहद कम रहा था। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि यदि संगठन को मजबूत किया गया और स्थानीय मुद्दों को सही ढंग से उठाया गया तो कई सीटों पर तस्वीर बदल सकती है। प्रदेश नेतृत्व लगातार जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में बैठकों के जरिए कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में जुटा है। कांग्रेस की रणनीति भाजपा सरकार के खिलाफ जनभावनाओं को चुनावी समर्थन में बदलने की है।
दोनों दलों में संभावित उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर भी नजर रखी जा रही है। जिन नेताओं की अपने क्षेत्रों में सक्रियता कम पाई जाएगी, उनके टिकट पर संकट खड़ा हो सकता है। पार्टी संगठन अब केवल राजनीतिक पहचान नहीं बल्कि जमीनी पकड़ और जनसंपर्क को भी टिकट का आधार बनाने की तैयारी में है। गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर तराई के मैदानी इलाकों तक राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। गांवों की चौपालों, बाजारों और सामाजिक आयोजनों में नेताओं की मौजूदगी बढ़ने लगी है। चुनाव भले दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है।
उत्तराखंड की राजनीति में यह दौर चुनावी तैयारी का पहला अध्याय माना जा रहा है। भाजपा अपनी सत्ता बचाने और इतिहास रचने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस सत्ता में वापसी का अवसर तलाश रही है। फिलहाल दोनों दलों की नजर उन सीटों पर है जहां पिछली हार ने उन्हें सबक दिया था। आने वाले महीनों में यही सीटें चुनावी रणभूमि का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाली हैं।

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