देश की राजनीति में इन दिनों जितनी तेजी से घटनाओं और स्थितियाें परिस्थितियों का प्रैक्टिकरण हो रहा है उससे ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार कुछ ही दिन या महीनों में सब कुछ निपटा देना चाहती है। वह कोई काम किसी अन्य सरकार के लिए छोड़ना नहीं चाहती है। पहलगाम के आतंकी हमले के एक सप्ताह बाद अचानक सरकार एक्शन में आई सरकार द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान पर जबरदस्त तरीके से हमला बोला गया। जिस तेजी से यह ऑपरेशन शुरू हुआ उसी तेजी से सीज फायर के साथ निपट भी गया। इससे पूर्व सरकार ने रात—रात भर चली संसदीय कार्रवाई के दौरान वक्फ संशोधन कानून को पारित कराने का काम किया गया जिसे लेकर विरोध के स्वर पहलगाम व ऑपरेशन सिंदूर की गूंज में न जाने कहां गुम हो गए। इसे लेकर एक बड़ा विवाद अभी भी जारी है। वही कई सारे मुद्दों को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका की सर्वाेच्चता की जंग इस कदर छिड़ गई कि सुप्रीम कोर्ट को सुप्रीम कोड़ा बताने से और संसद में ताला डालने तक बात कही जाने लगी। नये चीफ जस्टिस आर बी गवई के शपथ ग्रहण के बाद राष्ट्रपति ने उन्हें 14 सवालों वाला पत्र सौंप कर राष्ट्रपति भवन को इस विवाद में घसीट किया कि सुप्रीम कोर्ट बड़ा है या संसद या फिर राष्ट्रपति। हास्यापद बात यह है कि इतने सारे विवादों को हवा देने का काम करने वाले सभी पक्ष इस सत्य को अच्छी तरह जानते हैं कि संविधान से बड़ा कोई नहीं है। ना ही कार्यपालिका और ना ही न्यायपालिका और ना राजभवन या राष्ट्रपति। सभी को संविधान प्रदत अधिकारों के दायरे में रहकर ही अपना—अपना काम करना है। लेकिन विडम्बना देखिए की अपने अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले ही स्वयं को सर्वाेच्च सिद्ध करने में आमादा है। जबकि वह जानते हैं कि यह तभी संभव है जब सरकार संविधान को खारिज कर देगी और देश से लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा। जब तक संविधान है तब तक लोकतंत्र भी रहेगा। तथा न्यायपालिका और मीडिया भी रहेगा उसका अस्तित्व मिटाने की कोई कोशिश अंतिम रूप से सफल नहीं हो सकती है। इसी बीच अब सरकार द्वारा एक और नई पहल शुरू कर दी गई है वह है एक देश एक चुनाव। एक सर्वदलीय संासद दल उत्तराखंड आया हुआ है जो वन नेशन वन इलेक्शन के पक्ष में हवा बनाने में जुटा हुआ है। एक बात किसी की भी समझ मे सरलता से आने वाली है कि जो सरकार बीते 11 सालों देश में जनगणना तक नहीं कर सकी है जो 10 साल पहले हो जानी चाहिए थी वह एक देश एक चुनाव की व्यवस्था कैसे बना सकती है? सरकार ने अभी देश में जातीय जनगणना कराने की घोषणा की थी। पहले वह देश में जनगणना ही करा कर दिखा दे। एक राष्ट्र एक पहचान वाला आधार कार्ड अब पहचान पत्र नहीं रहा है। सरकार द्वारा कभी आत्मनिर्भर भारत की बात की जाती है तो कभी विकसित भारत का शगुफा छोड़ा जाता है। तो कभी हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने की बात कही जाती है। सवाल इस बात का नहीं है कि सरकार क्या कहती है सवाल इस बात का है कि सरकार ने अब तक क्या किया है। सरकार द्वारा महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए बड़े ही जोर—शोर से नारी बंधन कानून लाकर उन्हें आरक्षण देने की दावा किया गया। सरकार के पास आज तक इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि यह महिला आरक्षण उन्हें कब से मिल पाएगा। तब क्या राजनीति का नाम और काम सिर्फ शगूफेबाजी और लफ्फे लफ्फाजी करने तक ही सीमित है। हर समस्या से ध्यान भटकाने के लिए पिछले से भी बड़ी कोई ऐसी बात जनता के सामने लाकर पेश कर देना जिससे बीते समय में क्या कहां और क्या किया इस पर कोई बात ही ना हो पाये सरकार ने काला धन मिटाने के लिए नोटबंदी कर दी गई काला धन ना तो मिट सका है जितना काला धन था वह जरूर सफेद हो गया। आत्मनिर्भर भारत के 80 करोड लोग मुफ्त का सरकारी राशन खाकर जिंदा है और देश आत्मनिर्भर बन गया है। देश की प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा का बंटाधार हो चुका है और लोग आईआईटी खोलने में लगे हुए हैं। एक राष्ट्र एक चुनाव अब एक और नया शगुफा है।




