पुलिस की बगावत प्रदेश के लिए घातक

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उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण से पह ले भी यहांं पर पुलिस विभाग अनुशासित होता था। दरोगा के सामने सिपाही व अधिकारी के सामने दरोगा की बोलने की हिम्मत तक नहीं होती थी। राज्य निर्माण के बाद इस विभाग में थोडी सी तबदीली जरूर आयी थी कि सिपाही भी अपने अधिकार के लिए बोलने लगे थे। इसका मुख्य कारण था उनका ग्रेजुएट होना। पहले सिपाही आठवीं व दसवीं पास भर्ती होता था लेकिन राज्य बनने के बाद पुलिस भर्ती में बीए व एमए तक के छात्रों ने सिपाही के पद के लिए आवेदन किया और वह इसमें भर्ती हो गये। जिसके बाद अधिकारियों को भी सम्भल के चलना पडा। इसके बाद कई बार पुलिस विभाग में बगावत के स्वर उठते सुनायी दिये लेकिन अधिकारियों ने उनको शांत कर दिया। यहां सोचने वाली बात यह है कि जिस विभाग में दाढी व मूंछ रखने के लिए भी अनुमति लेने का प्रावधान हो उस विभाग में बगावत से सुर निकलना काफी खतरनाक बात है। जिस विभाग के ऊपर जनता की सुरक्षा का जिम्मा हो और जिसके कारण जनता अपने को सुरक्षित महसूस करती हो और उसी विभाग के कर्मचारी अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे हों तो यह काफी चिन्ता की बात है। पहले बगावत के स्वर ऐसे ही बिना किन्ही का रणों के उठते थे जिनको अधिकारियों द्वारा दबा लिया जाता था लेकिन इस बार तो सरकार ने ही बगावत करने का रास्ता व कारण दे दिया है। मुख्यमंत्री ने पुलिस विभाग में सिपाहियों का ग्रेट पे बढाने की घोषणा कर दी। लेकिन घोषणा मात्र घोषणा ही साबित हुई तो पुलिस विभाग के कर्मचारियों के परिवार वालों का आक्रोषित होना लाजमी था। हुआ भी कुछ ऐसा ही। पुलिस परिवार सडकों पर उतर आया और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गये। क्योंकि सरकार ने घोषणा तो कर दी लेकिन उसका शासनादेश जारी नहीं किया। जबतक शासनादेश जारी नहीं हुआ तब तक घोषणा को मात्र एक लालीपोप ही माना जाता है। यहां फिर बात सामने आ गयी पढे लिखे व अनपढ वाली। पहले सिपाही आठवीं व दसवीं पास होता था उसको इस बात की ज्यादा जानकारी नहीं होती थी उसको जो अधिकारियों ने बोल दिया उसके लिए वहीं सबकुछ होता था। लेकिन अब तस्वीर दूसरी है अब सिपाही ग्रेजुएट है उसको अपने अधिकारों के बारे में पता है इसलिए उसको गुमराह करना इतना आसान नहीं हैं। अब सिपाही वो सिपाही नहीं रह गया कि जिसको रात में बारिश में खडा कर दो तो वह अधिकारी की बात को सरोपरी मानता था लेकिन अब सिपाही पढा लिखा है तो बारिश में खडे करने वाले अधिकारी से साफ शब्दों में छाते की मांग करता है। इसलिए अब काफी हद तक अधिकारी भी यह समझ चुके हैं कि अब वह जमाना नहीं रह गया कि आप अपनी मनमर्जी कर सकें। लेकिन नेताओं को अभी तक इस बात का अभास नहीं था। उन्होंने अभी भी वहीं पुराना जमाना समझ रखा है कि घोषणा कर दी और सब खुश हो जायेंगे लेकिन अब ऐसा नहीं है अब तो अगर घोषणा की है तो उसको अमल में भी लाना होगा नहीं तो विरोध के स्वर सुनने पढेंगे। अब हालात ऐसे हो गये हैं कि जहां एक ओर पुलिस परिवार सडकों पर उतर आया तो वहीं सिपाहियों ने भी अपने इस्तीफे देने व वीआरएस लेने की घोषणाएं कर दी। जो कि इस प्रदेश के लिए काफी घातक साबित हो सकता है। जो फोर्स अपने अनुशासित होने के लिए जानी जाती हो और उसमें ही बगावत के स्वर निकलने शुरू हो जायें तो यह प्रदेश व समाज के लिए घातक साबित होगा जिसको ध्यान में रखते हुए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे नहीं तो यह सरकार के लिए और इस प्रदेश के लिए काफी घातक साबित होगा।

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