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गोल—गोल घूमते सवाल

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ऑपरेशन सिंदूर पर सीज फायर के फैसले से उपजे तमाम सवालों के बीच बीते कल शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों को संबोधित करने के लिए टीवी चैनलों पर लाइव आए। पीएम मोदी को चाहिए तो यह था कि वह इतने अहम मुद्दे पर पत्रकार वार्ता करते और उन सवालों का बेबाकी से जवाब देते जो देश की जनता के मन को मथ रहे हैं। लेकिन पीएम मोदी जो सवाल सुनना नहीं चाहते सिर्फ अपनी बात कहने के आदी हैं उन्हें यह ठीक नहीं लगा होगा। यही कारण है कि वह विपक्ष के किसी मुद्दे पर विशेष सत्र बुलाने की मांग को नजरअंदाज कर चुके हैं और सर्वदलीय बैठकों में उन्होंने उपस्थित होना भी जरूरी नहीं समझा। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ऑपरेशन सिंदूर को देश की सुरक्षा एजेंसियों, सुरक्षा बलों व सेना की अभूतपुर्व कार्यवाही बताते हुए इसे देश की मां—बहनों व बेटियों को समर्पित बताया गया। यह बहुत अच्छी बात है कि कम से कम देश के प्रधानमंत्री को उनके सिंदूर की सुरक्षा का इतना अहसास तो है कि वह उनकी सुरक्षा के लिए बड़ी से बड़ी आपदा का जोखिम लेने में पीछे नहीं हटते हैं भले ही वह किसी देश के साथ युद्ध ही क्यों न हो। अपनी सेनाओं के प्राक्रम को तो हम सभी इन चार दिनों में देख ही चुके हैं जिन्हें हर देशवासी सेल्यूट कर रहा है। पीएम ने अपने संबोधन में बहुत सारी महत्वपूर्ण बातें कहीं उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर स्थगित किया गया है समाप्त नहीं। यानी कि इस सीज फायर का महत्व सिर्फ तब तक ही है जब तक कोई अगली आतंकी घटना नहीं होती। सीधे तौर पर कहा जाए तो आतंकी घटना भी होगी और फिर युद्ध भी होगा तथा वह आतंकवाद की जड़ों को उखाड़ फेंकने तक होगा। उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण बात कही है कि भारत अब परमाणु हथियारों के नाम पर ब्लैकमेलिंग को कतई नहीं सहेगा? सवाल यह है कि क्या यह सीज फायर का फैसला परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का डर दिखाकर किया या कराया गया है? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सीज फायर के फैसले के साथ परमाणु खतरे की जिस बात को चिपकाया था क्या पीएम मोदी का यह जवाब ट्रंप को दिया गया जवाब माना जाना चाहिए? या फिर उसके पीछे कई अन्य तथ्य छुपे हुए हैं अपने पूरे संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आतंक के मुद्दे पर पाक को तो भरपूर नसीहतें दी गई लेकिन उन्होंने ऐसा किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया जो जरूरी थे। उन्होंने यह तो बता दिया कि सीज फायर की पहल करने वाला पाकिस्तान ही था लेकिन यह नहीं बताया कि इस सीज फायर की घोषणा अमेरिकी धरती से ट्रंप द्वारा क्यों की गई? कश्मीर समस्या पर प्रधानमंत्री ने यह तो कह दिया कि पाकिस्तान से अब आगे अगर कोई वार्ता होगी तो वह कश्मीर पर नहीं सिर्फ पीओके पर ही होगी लेकिन ट्रंप ने कश्मीर समस्या के समाधान करने की बात क्यों की गई? इस पर वह कुछ भी नहीं बोले। अमेरिका को इस द्विपक्षीय मामले में हस्तक्षेप का मौका किसने दिया? मोदी के इस संबोधन से कुछ सवालों का पूरा जवाब नहीं मिल सका कि सीज फायर सहमति के क्या कारण थे। ठीक है भारतीय सेना ने आतंकी कैंप तबाह कर दिए लेकिन पहलगाम हमले में 28 लोगों की हत्या करने वालों का क्या हुआ वह मारे गए या पकड़े जा चुके हैं। इसका कुछ अता—पता नहीं चला। न ही इस ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना व सुरक्षाबलों की कितनी हानि हुई इसकी कोई जानकारी प्रधानमंत्री ने दी और न उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए दो शब्द बोले गए। पीएम ने न उस सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी को कोई नसीहत दी गई जिन्होंने टीआरपी के लिए देश की सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मिथ्या जानकारी देने की सारी हदें पार कर दी। जिसके कारण पूरे विश्व में भारतीय मीडिया की थू—थू हुई। भले ही अब सत्ता पक्ष के तमाम प्रवक्ता और उनका आई टी सेल इस ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के प्रचार प्रसार में जी जान से जुट गए हो और इस युद्ध जैसे आपदाकाल को भी अवसर में बदलने की कोशिशे शुरू हो गई हो लेकिन ट्रोलरो का वह टिड्डी दल जो अभी रक्षा सचिव और सीज फायर के फैसले को लेकर सरकार पर टूट पड़ा था अगर ऐसा हुआ तो सरकार क्या करेगी यह सवाल इसलिए भी अहम हो चुका है क्योंकि देश की टीवी मीडिया व प्रिंट मीडिया अपनी विश्वसनियता को खो चुका है।

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