अखबारों में छपी और टीवी चैनलों पर दिखाई जा रही उस तस्वीर को देखकर आपको गुस्सा जरूर आ रहा होगा जिसमें गृहमंत्री अमित शाह जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में कतारों में रखें ताबूतों पर फूल मालाएं चढ़ाकर पहलगाम के मृतकों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। ऐसी ही एक तस्वीर आपने फरवरी 2019 में देखी होगी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर लाइनों में रखे ताबूतों की परिक्रमा कर रहे थे। इन दोनों घटनाओं का समय और स्थान अलग हो सकता है तथा श्रद्धांजलि देने वाले चेहरे जरूर अलग है तथा ताबूतों की संख्या में भी थोड़ा अंतर हो सकता है लेकिन 6 साल पहले और आज की घटना के पीछे जाने वाला सवाल अलग नहीं है तब भी लोगों में इस बात को लेकर गुस्सा था कि आखिर हम कब तक आतंकवादियों के हमले के शिकार होते रहेंगे तथा कब तक अपने सैन्य जवानों और निर्दाेष नागरिकों के ताबूतों पर फूल मालाएं चढ़ाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते रहेंगे। तब पुलवामा में 40 सीआरपीएफ के जवानों को हमने खो दिया था और दो दिन पूर्व पहलगाम में अब 28 पर्यटकों को हमने आतंकी हमले में खो दिया है। सवाल यह है कि इन लोगों की हत्याओं के लिए जिम्मेदार कौन है सत्ता शीर्ष पर बैठी सरकार या फिर वह आतंकवादी जो कहीं भी और कभी भी आते हैं और हमें मार कर चले जाते हैं या फिर वह पाकिस्तान जिसके सर हम हर एक आतंकी वारदात का ठीकरा फोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। पुलवामा हमले के बाद सरकार ने सीमा पर जो एयर स्ट्राइक किया था वह अगर पाकिस्तान को दिए जाने वाला इतना ही करारा जवाब था जितना सरकार ने इसका प्रचार किया था और इसके बारे में आज भी कहा जाता है कि यह पहले वाला भारत नहीं है हमें अगर कोई छेड़ता है तो हम उसके घर में घुसकर उसे मारते हैं। इस एयर स्ट्राइक में अगर इतना ही दम होता तो पाकिस्तान आज पहलगाम जैसी घटना को अंजाम देने की हिमाकत नहीं कर सकता था। पहलगाम जहां पर्यटकों को पहले एक लाइन में घुटनों के बल बैठाया गया और फिर कलमा पढ़ने को कहा गया और कलमा न पढ़ने पर गोलियों से भून दिया वह तालिबानी कानून नहीं तो और क्या है? इस घटना के बाद अब देश के नेता फिर चुन चुन कर मारने और घर में घुसकर मारने तथा जल्द करारा जवाब देने जैसे बयान दे रहे हैं। इन बयान वीर नेताओं के साथ—साथ सोशल मीडिया का एक वर्ग इसे हिंदुओं पर हमले का ढोल पीटकर ध्रुवीकरण की राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुट गया है। कुछ सेवानिवृत सैन्य अधिकारी टीवी चैनलों की चर्चाओं में सरकार को लताड़ते दिख रहे हैं और सरकार पर सेना को कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं। वही देश के आम नागरिकों की आंखों में आंसू है और आक्रोश है। वह राष्ट्र और राष्ट्रीयता को पीछे धकेल कर आगे बढ़ने वालों का तमाशा देखकर हैरान है लेकिन सरकार से वह कोई सवाल नहीं करते। वह जानते हैं कि आतंकवाद की यह लड़ाई देश में एक नहीं कई स्तरों पर चल रही है सीमा पार के आतंकवाद से भले ही कोई सरकार या सेना निपट भी ले लेकिन राष्ट्र के अंदर के आतंकवाद से निपटना उससे भी कठिन चुनौती बन चुका है।




