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फिर वही सुलगते सवाल

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गैरसैंण में आहूत विधानसभा का ढाई दिवसीय मानसून सत्र भले ही कई दिन पूर्व संपन्न हो गया हो मगर इस सत्र के बाद सुलगते सवालों की अनूगंूज अभी सुबाई राजनीति का धुंआ—धुंआ कर रही है। खानपुर विधायक उमेश शर्मा द्वारा सत्र के दौरान सदन में सहारनपुर के गुप्ता बंधुओं के जरिए सरकार को गिराने के लिए 500 करोड़ में हुए सौदेबाजी की बात उठाया जाना वास्तव में अत्यंत ही गंभीर मामला है। इसे लेकर अब तमाम विपक्षी नेताओं द्वारा यह सवाल किया जा रहा है कि सरकार को उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि उनके पास यह जानकारी कहां से आई और उनके पास क्या इसके कोई पुख्ता सबूत है? जिससे यह पता चल सके कि आखिर वह कौन लोग हैं जो एक चुनी हुई और प्रचंड बहुमत वाली सरकार को गिराना चाहते हैं? उनके द्वारा क्योंकि यह बयान किसी जनसभा में नहीं सदन में दिया गया है इसलिए भी इसे गंभीरता से लिया जाना जरूरी है। मुख्यमंत्री द्वारा उनके इस बयान पर जो सिर्फ एक लाइन में दिया गया जवाब था कि सरकार इसकी जांच कराएगी वह भी हैरान करने वाला है ऐसा लगता है कि जैसे मुख्यमंत्री को पहले से इसकी जानकारी थी। अगर थी तो उन्होंने इस पर क्या कुछ किया? पूर्व मुख्यमंत्री तथा सांसद डॉक्टर निशंक ने भी इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार को उमेश शर्मा से पूछना चाहिए। वहीं पूर्व सीएम हरीश रावत ने तो उमेश के इस खुलासे पर उन तमाम पूर्व कांग्रेसी नेताओं पर निशाना साधा है जिन्होंने 2016 में उनकी सरकार गिराने और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कराने का काम किया था। राज्य गठन से शुरू हुए इस सरकार गिराने और सरकार बनाने का खेल जो पहले से जारी है वह हमेशा जारी रहेगा यह कभी खत्म होने वाला नहीं है यह बात एक बार फिर साबित हो चुकी है। दूसरा एक महत्वपूर्ण सवाल कांग्रेस नेता गणेश गोदियाल के उस बयान से खड़ा हुआ है जिसमें उन्होंने इस सत्र की उपलब्धि सिर्फ माननीयों के वेतन भत्तों में सवा लाख रुपए प्रति माह की वृद्धि को बताया गया है। गणेश गोदियाल इस वृद्धि का लाभ लेने से इनकार करते हुए इसे अनुचित वृद्धि क्या बताया गया वित्त मंत्री अग्रवाल ने उन्हें बड़ा आदमी भी बता दिया। गणेश गोदियाल भी कहां चुप बैठने वाले थे उन्होंने भी अब अग्रवाल को खुले मंच से चुनौती दे डाली है कि उन्हें अगर मैं बहुत अमीर आदमी दिखता हूं तो मैं उन्हें अपनी सारी संपत्ति देने को तैयार हूं इसके बदले में वह मुझे अपनी संपत्तियों का सिर्फ चौथाई हिस्सा ही दे दें। निसंदेह गणेश गोदियाल ने कोई अनुचित बात तो नहीं कही थी कि देश के 90 फीसदी लोग अत्यंत ही सीमित आय में गुजारा करते हैं इनमें से आधे से अधिक तो 15—20 हजार में जीवन जीने पर विवश है जो इस महंगाई के दौर में अत्यंत कठिन है ऐसे में माननीय अपने वेतन भत्ते बढ़ाते चले जा रहे हैं जो अनुचित है। लेकिन गणेश गोदयाल की यह अच्छी बात भी वित्त मंत्री को अच्छी नहीं लगी। खैर जब भी गैरसैंण में सत्र होता है तो कुछ न कुछ बड़ा धमाका होता ही है। अब इन धमाकों से निकली आग और धुएं का क्या प्रभाव देखने को मिलेगा आने वाला समय ही बताएगा।

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