जम्मू कश्मीर में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र भरने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। 10 साल के अंतराल बाद होने वाले जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनाव किसी पार्टी और दल के लिए आसान रहने वाले नहीं है। क्योंकि इस चुनाव में तमाम तरह की विसंगतियों का सामना राजनीतिक दलों को करना ही पड़ेगा। भाजपा जिसने जम्मू कश्मीर से धारा 370 की 35 ए को हटाने का काम किया था कल सुबह उसने अपनी एक 44 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की लेकिन इस लिस्ट के जारी होते ही भाजपा के जम्मू कश्मीर कार्यालय में हंगामा खड़ा हो गया। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र रैना से लेकर ओमी खजुरिया सहित तमाम प्रमुख नेताओं के नाम उम्मीदवारों की सूची से गायब देख कार्यकर्ता बगावत पर उतर आये तो भाजपा ने 2 घंटे बाद ही सूची को वापस ले लिया और शाम को सिर्फ 15 प्रत्याशियों की संशोधित सूची जारी की गई। अब देखना यह है कि भाजपा इस चुनाव में अपने कितने उम्मीदवार उतारती है और किस नेता को संतुष्ट कर पाती है। लेकिन इसे कोई अच्छा आगाज नहीं माना जा सकता है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में भी अपना कोई प्रत्याशी घाटी में चुनाव मैदान में नहीं उतारा था। राज्य में चुनाव पूर्व भाजपा का गठबंधन भी किसी अन्य दल के साथ नहीं हो सका है। क्योंकि महबूबा मुफ्ती के साथ उसकी पिछली सरकार चलाने का अनुभव अच्छा नहीं रहा था। उधर कांग्रेस के साथ नेशनल कांफ्रेंस का चुनाव पूर्व गठबंधन हो जरूर गया है लेकिन नेशनल कांफ्रेंस द्वारा अपना जो अलग घोषणा पत्र जारी किया गया है उसमें जिन मुद्दों को शामिल किया गया वह कांग्रेस के लिए भी मुफीद नहीं दिख रहे है। अब्दुल्ला के इस घोषणा पत्र में जम्मू कश्मीर में फिर 370 की धारा 35 ए को बहाल करने और कैदियों की रिहाई की बात की गई है। हालांकि सत्ता में आने के बाद भी सरकार के पास ऐसा करने की संवैधानिक ताकत और अधिकार नहीं होगा। क्योंकि धारा 370 की 35 ए का मामला एक संवैधानिक मामला है जिसका अधिकार केंद्र की सरकार के पास है तथा कैदियों की रिहाई बिना गृह मंत्रालय की संस्तुति के नहीं हो सकती है। अभी बीते दिनों जब मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जम्मू कश्मीर गए थे तब नेशनल कांफ्रेंस के साथ हुए चुनावी गठबंधन पर भी भाजपा ने सवाल उठाते हुए कहा था कि कांग्रेस सत्ता के लालच में आतंकवाद और पाकिस्तानी घुसपैठ का समर्थन बताते हुए कहा था कि कांग्रेस कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा देने का काम कर रही है। अब अपने घोषणा पत्र से अब्दुल्ला ने इसे प्रमाणित करने का जो काम किया है उसे कांग्रेस पसंद नहीं कर सकती है। देखना होगा कि अब इस पर कांग्रेस का क्या रुख रहता है। कांग्रेस को खास कर जम्मू कश्मीर के इस चुनाव में फूंक—फूंक कर कदम रखने की जरूरत है। अभी तक कोई भी दल अपने उम्मीदवारों की सूची भी फाइनल नहीं कर सका है जबकि नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। 90 सीटों के लिए होने वाले इस चुनाव में भले ही सर्वे कुछ भी कह रहे हो लेकिन जिस तरह की स्थितियां बनती दिख रही है किसी भी दल या नेता के लिए जम्मू कश्मीर का यह चुनाव आसान रहने वाला नहीं दिख रहा है।



