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व्यवस्थाओं पर सवाल

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दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को देश की सर्वोच्च अदालत ने जमानत दे दी और 17 महीने के बाद वह कल तिहाड़ जेल से बाहर आ गए। उन्होंने अपने पहले भाषण में केंद्र की उसे तानाशाह सरकार पर जबरदस्त हमला बोलते हुए कहा कि अगर डॉ अंबेडकर का संविधान न होता तो यह संभव नहीं हुआ होता। उन्हें जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा देश की ईडी और सीबीआई जैसी संवैधानिक संस्थाओं और निचली अदालतों के बारे में जिस तरह सख्त टिप्पणियां की गई हैं वह काबिले गौर है। 2014 से लेकर 2024 तक ईडी और सीबीआई द्वारा बिना ठोस सबूतों और साक्ष्यों के कई-कई महीने और सालों तक जेल की सलाखों के पीछे ठूस देने का काम किया जाता रहा है और निचली अदालतों द्वारा उन्हें जमानत न देकर न्यायपालिका की मूल भावना से पल्ला झाड़ने का काम किया जाता रहा है उसे लेकर न्याय पीठ ने जिस तरह की नाराजगी जताई है वह अत्यंत ही गंभीर है लेकिन उससे किसी भी तरह की व्यवस्थागत सुधारों की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि देश का समूचा सिस्टम अपनी संवैधानिक ताकत और शक्तियों का दुरुपयोग करने का आदी हो चुका है। पीठ का कहना था कि जमानत न्याय का नियम है और जेल अपवाद। इस बात को निचली अदालतों को समझने की जरूरत है। मनीष की बात करें तो उनकी जमानत अर्जी को दो बार ट्रायल कोर्ट से और दो बार हाई कोर्ट से खारिज किया जा चुका था अब सुप्रीम कोर्ट में भी ईडी द्वारा उन्हें जमानत न देने का विरोध यही कहकर किया जा रहा था कि अभी इस मामले का ट्रायल पूरा नहीं हुआ है तथा मनीष केस को प्रभावित कर सकते हैं लेकिन ईडी के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि ट्रायल कब तक पूरा हो जाएगा और अगर अगले साल 2 साल में भी ट्रायल पूरा नहीं होता है तो उन्हें किस आधार पर जेल में रखा जा सकता है यह किसी भी नागरिक के स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है। मनीष इस तरह के उत्पीड़न के अकेले उदाहरण नहीं है। झारखंड के मुख्यमंत्री सोरेन और दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और शिवसेना के संजय राउत सहित दर्जनों नेता, लेखक तथा पत्रकारों की एक लंबी फेहरिस्त है। जिनके खिलाफ ईडी और सीबीआई द्वारा यह सांप सीढ़ी का खेल खेला जा रहा है कि उन्हें बिना ठोस गवाह सबूतों के पहले गिरफ्तार किया जाता है और जमानत का विरोध कर सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से फिर निचली अदालतों में भेजने का काम किया जाता रहा है। अभी इससे पूर्व आप सांसद संजय 6 माह बाद जेल से छूटकर बाहर आए थे क्योंकि उनके खिलाफ ईडी कोई सबूत पेश ही नहीं कर सकी थी। ठीक वैसा ही सोरेन के साथ भी हुआ था। सवाल यह है कि ईडी और सीबीआई की संस्थाएं क्या इसलिए बनी है कि सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाने वाले विपक्षी नेताओं को जेल पहुंचाती रहे वह भी बेवजह बिना ठोस सबूतों के। इन मामलों ने सरकार से लेकर न्यायपालिका और ईडी तथा सीबीआई तक सभी को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। विपक्ष अब खुलकर सत्ता पर तानाशाही का आरोप और लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाकर अघोषित आपातकाल लागू करने की बात कह रहा है। सवाल यह है कि क्या इन तमाम व्यवस्थाओं को बदला जा सकता है? 

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